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________________ चैत्य श्री-D|| जओ-अग्गीह विणा दाहो उसाससमणियं हम भरणं रज्जूइ विणा बंधो चिंतादुक्खाण रिंचोली॥३३।। तथा-|| बन्धुदत्तधर्म० संघा- वारियवासासच्छंदगामिणी अन्नमन्त्रमणुरत्ता। नारिव्य चलसहावा चिंता जीयं कयत्थेइ ॥ ३४ ॥ दटूठुमह तं कथा चारविधी सचिंतं धणय चितइ दुही सुओ मरिही । तो दुहबिस्सरणकए बाबारे कंमिवि खिवामि ॥३८॥ इय चिनिय सो अणिओ घणवरणा ॥२२१॥ वच्छ! गच्छ अत्वत्थं । संतरं विणा तेण जेण पुरिसो न किंचि जओ ॥३६॥ नियभुयविद्वत्तविहवो मणोरहे मागणाणवि पुरंतो। सलहिजइ जो न लोए चलंतधाशू न सो पुरिसो ॥ २८ ॥ तथा-जाई कुलं च रूवं तिनिवि निवइंतु कंदरे विउले । अत्युच्चिय परिवुडउ जेण गुणा पायडा टुंति ॥३८॥ अह पिउणो आएसं एवं सोऊण बंधुदत्तो या चितेइ न संपजह सुहेण लच्छी जओ भणियं ॥३९॥ जा जीवियं जणेणं घडावियं नेव संसयतुलाए। ता किं संपज्जइ संपयाउ जा चिंतिया चित्ते ॥ ४० ॥ इच चिंतिय पिउआणाइ गिहिउं पहुयविविहभंडाई । आरुहिय पवह तरिय जलनिहिं सिंहलेहिं स गओ ॥४१॥ सारेणुवयारेणं उपयरिशो सिंहलेसरो तुहो। मिल्हेइ सुकदाणं सबस्सवि तस्स पणियस्स ॥४२॥ बहुलाभेणं पणियं विक्किणि गिण्डिउं च पडिपणियं । सो नियनयराभिमुहं अह चलिभो जाव जलहिमि ॥४शा एबलपडिकूलपवणप्पणुल्लियं तस्स पवहणं तत्य। तो चुई तुगुणं पावेण भवष्णवे व जिओ ॥४४॥ मुहकंसिरोवि पडिओ अणत्थसत्थंमि अहह किह अहवा । अत्थं पत्थेमाणा दुहदंदोलिं लहंति जिया ॥१५|| भणियं च-"अर्थानामर्जने दुःखमर्जितानां च रक्षणे । आये दुःवं व्यये दुःख,धिगर्थे दुःखभाजनम् ॥४६॥ आसाइयसुहफलएण तेण अह मच्छगाइयंमि सहिं । संसारे मणुयभवुद कहवि पत्तोरयणदीनो॥४७॥ खणसंजोगरिओगावहाई खणवसणऊसवमयाई । खणदिनपिम्माइंजेण विहिणो विलसियाई ॥२२१॥ ANTIPSnomiHithahin MRITAHARIYANAMAHAPain बाबाmammind ilamNLIM
SR No.600278
Book TitleChaityavandanbhashyam
Original Sutra AuthorDevendrasuri, Dharmkirtisuri
Author
PublisherJinshasan Aradhana Trust
Publication Year1988
Total Pages490
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size12 MB
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