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गुणनिहिम्मि ।।१५४॥ परिहासतोसपंडियकहाहिं सुहमच्छिऊण बहुदियहे । पीहिययदुक्खभीरू तहावि गमणूसुओ जाओ ॥१५५।। भणिओ य तेण राया तुह पाया देव! दुच्चया अम्हं । तहवि पियरो महंतं काहिति मणे असंतोसं ॥१५६।। सट्ठाणमओ जामो अणुजाणह राइणा तओ भणियं । पियदसणधणजसजीवियाण को लहइ पअत्ति ?।।१५७।। ता कुमर कि भणिजं तहावि जह संगमो पुणो होइ। सिग्घं चिय तह जत्तो कजो पीऊसवुद्धिसमो ।।१५८॥ सुविणेवि मा कुणेजसु देवीए कलावईए विसयम्मि । चितं, जओ न रयणं कस्सवि चिंताए अग्धेइ ।।१५९॥ जयसेणकुमारेणवि भणियं सचं ण अन्नहा एयं । जं पुण इह भणियव्वं ताए पुरावि भणियं तं ॥१६०।। नासगभूया तुम्हाणमप्पिया सव्वहावि तुन्भेहिं । एसा चितेयव्वा वसणे तह ऊसवे य सया ॥१६१॥ इय संभासपरो सो विरहग्गिकरालियंव रुयमाणि । संठाविउ कलावइमणुगम्मतो नरिदेण ।।१६।। कुमरो गंतुं लग्गो कमेण पत्तो य देवसालम्मि । दिट्ठा पियरी हिट्रेण साहिओ वइयरो सव्वो ।।१६३।। संखोवि य खोणिवई संपुन्नमणोरहो सह पियाए । तीए अपत्तविरहो भोए भोत्तुं समारद्धो ।।१६४॥ तीए अदंसणे हिययनिव्वुई न हु खणंपि पावेइ । नियजीवियंपि दिच्छइ अच्छइ सइ तकहक्खणिओ X ॥१६५॥ किं बहुणा । कजाई कुणइ अंगं चित्तं चिट्ठइ कलावई जत्थ । अंतेउरंपि सव्वं कलावईणामगं जायं ॥१६६॥
तह तीए तणुईए रन्नो रुद्ध विसालमवि हिययं । ओगास जह अण्णा पावइ थेवंपि नो तत्थ ॥१६७ । सा पुण न मुणइ वोत्तुं कयावि अलियं न यावि पेसुन्न । ईसावसं ण गच्छइ न यावि सोहग्गगव्वं च ॥१६८॥ जाणइ पियाई भणिउं जाणइ सव्वस्स उचियपडिवत्ति । जाणइ दुहिएसु दयं जाणइ परिपालिउ सोलं ॥१६९।। हयहियओ होइ णिवो
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