________________
॥६६३
मे कंठे उक्कंठियमणाओ? ॥६३॥ भुजंतीओं चिय णराण मयणरसकारणं जओ होति । तयभावे किमिह सुहं जायइ मयरमणिरमणेव ॥६४।। अहवा सहेमि कालं परिणामे.सिज्झिही इमं सव्वं । भुक्खियवसेण पञ्चंति उंबरा पेह कईयासि ॥६५॥ इचितिरेण तुरियं ताओ अंतेउरंमि खित्ताओ। सयणासणाई सव्वं दवावियं चंगभोगंगं ॥६६॥ तं पुण विसंव गणिउं ताओ गुरुदुहतवग्गितवियाओ। उबविट्ठाओ धरणीयलम्मि सुद्धम्मि सुद्धाओ ।।६७।। भणियाओ य सविणयं रायनि उत्ताहिं बाहुजुत्ताहिं । चेडीहिं निउणमेयं देवीओ मुयह उव्वेयं ।।६८।। फलियं तुम्हाण फुडं पुवजियपुन्नपायवेणज । जं एस अम्ह सामी वट्टइ अञ्चंतमणुकूलो ।।६९।। जस्स पसज्जइ एसो तस्स हु चिंतामणिव्व सुहहेउ । रुट्ठो जमोव्व जीवंतकारओ होइ नियमेण ॥७०॥ ता एयस्य पसाया भुंजह भोए वइच्छियविसाया । मुंचह मणसंतावं कुणह कयत्थं पणयभावं ॥७१। इयजंपिरचेडीओ भणियाओ सुठ्ठनिठुरमिमाहिं । उव्वेवकरेण हला ! अलाहि हलबोलकरणेण ॥७२॥ जइ सट्ठो जीयंत करेइ ता सुठु सुंदरो एस । अखलियसीलाण जओ जणयइ मरणंपि सुहमेव ।।७३।। मड्डाग हणेण परित्थियाओ भुंजइ य नेह भिल्लोवि । लंघियकुलमज्जाओ तओवि अहमो इमो जाओ ॥७॥ इच्चाइवयणनिब्भच्छियाहिं चेडीहिं साहियं रणो। उच्चडइ ण चक्को कहवि देव ! फलिहामलसिलासु ॥७५॥ णाऊण निच्छयं नरवईघि चिताउरो दढं जाओ। तत्तपुलिणम्मि मीणोव्व ण हु रई लहइ सयणीए ॥७६।। अविय ॥ सुयइ सुहं
गयराओ घणकंटय संगएवि सयणीए। रागीवि हंसतूलीगओवि निदं न पावे ॥७७॥ चिंतग्गिसंपलित्तो रयमि * संवच्छरोवमं गमिउं । कयसिंगारो सूरोदयम्मि तासिं गओ पासं ॥७८॥ अन्भुट्ठिओ न ताहिं तुच्छंपि न इच्छिमो
॥६६३।।