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रीचरितम्
उपदेशपदः अट्टवसट्टो सो तइया वेयरुइभट्टो ॥१७॥ पीयासवाव्व धुत्तीरिओव्व विसघारिओव्व गहिलेोव्व । जाओ तओ वराओ महााग्रंथः
कजाकज्जाइमइविमुहा ॥१८॥ अण्णदिणे संभाविय किं तीए वज्जियस्स जीएण । अवउज्झिऊण सव्वं सागेयाओ विणिक्खंतो ॥१९।। चलिओ सावत्थि पइ तल्लाभोवायमग्गणसयोहा । पत्तो गिरिदुग्गगिरि पल्लि सबराण सुविसालं ॥२०॥
ओलग्गिउं पवत्तो तयहिवई विणयसारमचंतं । जाओ पच्चयठाणं कमेण सेा सबरपवरस्स ।।२१।। अब्भत्थिओ विस॥६५२॥ त्थो बडुणा सबराहिवो अह कयाई । सावत्थिपुरोहियमंदिरम्मि धाडीनिमित्तेण ॥२२॥ पडिवजिऊण तेणवि लक्खिय
थक्केहि चरनरेहि तओ। दिन्ना झडत्ति धाडी निहेलणे पुन्नसम्मस्स ॥२३॥ अवसायणिविज्जाए पसुत्तपायम्मि परियणे सहसा। सव्वं से घरसारं अवहरियं सबरविसरेण ॥२४॥ बडुएणवि विलवंती गहिया गुणसुंदरी पहिलैण । संपा
विया य पल्लिं महरगिरं संठवंतेण ॥२५॥ भायणवत्थाहरणं संपायंतेण सबमक्खूणं । मणहरवयणविणोया पसाइया PM वासरे केइ ।।२६।। ___अन्नम्मि दिणे भणिया तुह सुयणु ! गुणकणेहिं विविहेहिं । जं तइया मम हरियं हिययधणं तं समप्पेहि ॥२७।। वियरामि सुन्नवुण्णो तेण विणा जीवियंतपत्तोव्व । कुणसु दयं ता धम्मिणि ! कि चिट्ठसि निठुरा सुठु ॥२८॥ अन्नं च । निवससि हियए सइणेस दीससे दिसिमुहेस घोलेसि । फुरसि फुडं जीहग्गे विहिणा दूरीकया जइवि ।।२९।। इयजंपिरे सविय
कमेव गुणसुंदरीए संलत्तं । नाहं मुणेमि सुंदर! इमस्स भणियस्स परमत्थं ।।३०।। कइयावहं वहरियं को सि तुमं कत्थ ते lal सुपुव्वा हं । इय पुच्छिएण बडुणा निवेइयावेइयं निययं ॥३१॥ तं साऊणं चिंतइ इणमो गुणसुंदरी सुसविग्गा ।
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