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________________ ॥६४९॥ होतो। नो कयपावो एएसिं नयणविसयम्मि जीवंतो ॥८४॥ इच्चाइ चिंतयंतो भणिओ धम्मेण पुन्नकम्मेण । चिंतामिलाणवयणो कि चिट्ठसि मित्त ! तुममेवं ॥८५।। किं अत्थहाणिजणयं सयणविओगुब्भवं च तुह दुक्खं । किं वावि वाहिविहियं, सुणाहि णणु एत्थ परमत्थं ॥८६।। होही पुणोवि विहवो मिलिही सयणोवि जीवमाणस्स । वाहीवि न तिट्ठाही चिरं सहाए मइ धरते ।।८७।। गिम्हुण्हसोसियाणवि पुणो सिरी हाइ नईतलायाणं । झीणोवि ससी कइवय-12 दिणेहिं भुजो हवइ पुन्नो ॥८८। झडिऊण पल्लविल्ला पुणोवि जायंति तरुवरा तुरियं । धीराणवी धणरिद्धी गयावि न हु दुल्लहा एवं ।।८९।। अन्नं च । सव्वं चिय सुहदुक्खं पुवञ्जियसुकयदुक्कयविवाया । जायइ जियाण जं ता को खेओ सकयउवभोगे? ॥९०। जुत्तं च नायतत्तस्स जंतुणो सुहकयसाहणं निययं । जत्तो जायई जम्मंतरम्मि नहु दुस्सहं दुक्खं ॥९१॥ सोऊण तयणुसढि जंपइ इयरोवि मुकनीसासं । नियदुचरियं मोत्तुं न मज्झ दुहकारणं अन्नं ॥९२॥ तं मह दढं खु दुक्खं हिययग निसियनट्ठसल्लंव । जं खित्तो सि गभीरे समुद्दतीरे तुमं तइया ॥९३।। तं दहइ अविस्सामं हिययगयं उस्सुरांव जलमाणं । जं अहिलसिया एसा महासई कूरचरिएण ॥९४।। पत्तं पावस्स फल अचिरेण मए इहेव जम्मम्मि । अइपावोत्ति य काउं नीओम्हि न पेयवइणावि ॥९५॥ अहवा डज्झउ निहुयं निद्भूमं फुफुमव्व चिरमेसो। इय भाविऊण विहिणा धरिओऽहं पावभरिओवि ॥९६॥ जत्तियमेत्तं मेत्तय ! तुरियं संचरसि कारणे मज्झ । तत्तियमेत्तं अणुतावपावए खिवसि में अहियं ।।९७।। इय विविहं पलवंतो भणिओ सो रिद्धिसुंदरीएवि । धन्नो सि जेण पावे पच्छायानं वहसि एवं ॥९८॥ जं काऊणवि पावं पावा पायंति परमपरिओसं। धीरा न कुणंते च्चिय कएवि अणुताविणो दुक्खं ॥६४९।।
SR No.600269
Book TitleUpdeshpad Mahagranth Satik Part 02
Original Sutra AuthorJinendrasuri
Author
PublisherHarshpushpamrut Jain Granthmala
Publication Year1991
Total Pages448
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size8 MB
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