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________________ उपदेशप महाग्रंथ ॥५६२॥ एतासां समितिगुप्तिनामाहरणानि दृष्टान्तां निर्दिष्टा अत्र जैने मते पूर्वसूरिभिः। कीदृशानीत्याह-वरदत्तसाध्वादी- समितिगुन्यष्टौ समासतस्तानि प्रवक्ष्यामीति ॥६०७।। एतान्येवैकोनपञ्चाशद्गाथाभिर्व्याचष्टे ; | प्तिशुद्धि प्रकारवरदत्तसाहु इरियासमितो सक्कस्स कहवि उवओगो। देवसभाए पसंसा मिच्छद्दिहिस्सऽसद्दहणं ॥६०८॥१॥ आगम वियारपंथे मच्छियमंडुक्कियाण पुरउत्ति । पच्छा य गयविउठवण बोला सिग्यो अवेहित्ति ॥६०९।।२।। अक्खाभिरियालायणगमणमसंभंतगं तहचेव । गयगहणुक्खिवणं पाउणं च कायस्स सयराहं ॥६१०॥३॥ ण उ भावस्सीसिपि हु मिच्छा दुक्कड जियाण पीडत्ति । अवि उदाणं एवं आभागे देवतासो उ ॥६१।।४।। संहरण स्वदंसण वरदाणमणिच्छ चत्तसंगोत्ति । गमणालायणविम्हय जागंतरसंपवित्तीय ॥६१२।।५।। संगयसाह कारणिय रोहगे भिक्खणिग्गमण पुच्छा । कत्तो तुब्भे जगराओ को अभिप्पाओ णवि जाणे ॥६१३।।६।। तत्थ वसंताणं कहं अग्वावारा उ किमिह पंति । एत्थवि अव्वावारो कि साहणमाणमत्थंपि ।।६१४॥७॥ सुम्मइ दीसइ किंची सव्वं साहिज्जए न सावज्ज । किं वसहेत्थ गिलाणो किमिहाडह अपडिबंधाओ ॥६१५।।८।। चारग तुम्मे समणा को जाणइ अप्पसक्खिओ धम्मो। ण हु एत्थं छुट्टिज्जइ जं जाणह तं करेज्जाहि ।।६१६॥९।। ॥५५९॥ कह सत्ति मिय णु सत्तिमयसासण को णु एस सव्वण्ण । एमाइ अणुचियं सइ भासासमिओ ण भासेइ ॥६१७॥१०॥ वसुदेव पुथ्वजम्मे आहरणं एसणाए समिईए। मगहा गंदिग्गामे गायम धिज्जाई चक्कयरो ॥६१८॥११॥ तस्स य धारिणि भज्जा गब्भत्ताए कुओ उ आहूओ। धिज्जाई मओ छम्मासगब्भ धिज्जाइणी जाए ॥६१९॥१२॥
SR No.600269
Book TitleUpdeshpad Mahagranth Satik Part 02
Original Sutra AuthorJinendrasuri
Author
PublisherHarshpushpamrut Jain Granthmala
Publication Year1991
Total Pages448
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size8 MB
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