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________________ ******* KXXXXXXXXXXXXXX य रण्णा किमियं चिधंति चितियं तेण । पुट्ठोय तेण भणियं तुह सेवाकालमाणमिणं ॥४९३।। एत्तियउवाहणाओ घटाओ तं निसेवमाणस्स । न य दंसणमुवलद्ध कहिंचि तुह देव ! चलणाणं ॥४९४॥ सकयण्णुयाइ तेणं पुव्वX वयारे मणे सरतेणं । भणिओ संतुटुमणेण भद्द! मग्गाहि वरमेगं ॥४९५।। आपुच्छिय नियभजं पच्छा मग्गामि जं पियं तीसे । इय भणिऊणमइगओ नियगेहं, पुच्छिया सा य ॥४९६।। अइनिउणबुद्धिजुत्ता पाएण हवंति [इत्थ नारीओ। तो चिंतियमेईए बहुविहवो परवसो होही ॥४९७॥ एक्के कम्मि गिहम्मो पइदिवसं भायणं तुमं मग्ग । दीणारदक्खिणं तह पज्जत्तं एत्तिएणावि ॥४९८॥ इय भणिओ सो तीए रायाणं विन्नवेइ तह चेव । राया भणइ किमेवं अइतुच्छं मग्गियं तुमए? ॥४९९।। मइ तुटे मग्गिजइ रजं चलधवलचामराडोवं । विप्पकुलुप्पन्नाणं किमम्ह रजेण सो भणइ ।।५००। पढमं नियगेहम्मि य तो रण्णा भायणं सदीणारं। दिण्णं तओ कमेणं अंतेउरिगाइलोएणं ॥५०१॥ बत्तीस सहस्सा नरवईण बहुया कुटुंबकोडीओ । तत्थ निवसंति नयरे तप्पज्जंतं न सो जाइ ॥५०२॥ छण्णवई गामाणं कोडीओ तत्थ कुलसहस्साइं। कइया भारहपजंतमेस संजाहिहि वराओ? ॥५०३॥ तइया वाससहस्सं संभवई आउयं नराण परं। कह एयकालजीवी नयरस्सवि लहइ पजंतं? ॥५०४॥ एवं पुणरवि दुलहं जह चक्किगिहम्मि भायणं तस्स । तह मणुयत्तं जीवाण जाण संसारकंतारे ॥५०५।। अयं चात्र पूर्वाचार्यकृतो विशेषोपनयो दृश्यते;-यथा स साधितसकलभरतो ब्रह्मदत्तश्चक्रवर्ती, तथा निखिलजीवलोकमध्यसमुजम्भितधर्मचक्रवत्तित्वसाम्राज्यस्तीर्थकरः । यथासौ महाटवीपर्यटनपटुर्बटुः, तथा नरनारकादिपर्याय **** *****
SR No.600268
Book TitleUpdeshpad Mahagranth Satik Part 01
Original Sutra AuthorJinendrasuri
Author
PublisherHarshpushpamrut Jain Granthmala
Publication Year1989
Total Pages438
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size8 MB
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