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________________ श्रीउपदेशपदे XXXX गणिकारथिकहा० ॥१७४।। चारवई सउणरुयवियारं तु । जा पासइ ता पासइ एक चिय इंतयं समणं ॥७०॥ अवहीरियसउणरुओ जा चिट्टई ता पुणोवि वाहरई। हत्थगओ सयसहसो एसो तुब्भं अइगओ त्ति ।।७१।। संजायकाउगेणं भणिओ चोराहिवेण सो गंतुं । जं इत्थमत्थि तत्तं भयरहिओ तं कहेसु तुमं ॥७२॥ कहियं कंबलरयणं वंसंतो एत्थ अस्थि तो मुक्को । आगंतुं गणियाए समप्पई जाव ता तीए ॥७३।। गिहखालम्मि निहित्तं निरिक्खमाणस्स तक्खणं तस्स । भणइ तओ कहमेयं रयणमिणं मइलियं तुमए ? ॥७४।। मुद्धो सि तुमं सोयसि जमेयमप्पाणगं न उण समण ! । एयाओवि विलीणं रयणसमो मं जमणुसरसि ।।१५।। अइनिप्पिवासमेसा तीए पडिचोइओ पडिनियत्तो। इच्छामो अणुसद्धि भणिय गओ गुरुसमीवम्मि ।।७६। अइदुक्करदुक्करकारगो त्ति एवं स थूलभद्दमुणी । चिरपरिचिया असद्धी सम्म अहियासिया इमिणा ॥७७।। तुमए अदिट्ठदासा उवकासा जाइया कयवया य । निब्भच्छिओ पवन्नो पच्छित्तं चित्तसारंति ॥७८।। कइयाइ नंदरण्णा दिन्ना तुटेण नियगरहियस्स । कासा सा पुण निच्चं पसंसए थूलभद्दमुणिं ॥७९।। कह अन्नो तह इत्थीपरीसहं जिणइ जियमयणपब्भारो । जो न ममाओ तिलतुसतिभागमित्तंपि संखुद्धो ॥८॥ संति चिय अच्छेरगकरा जणा भूरिणो इहं लाए । नहु थूलभद्दसरिसो भूओ होउ चिय 'कयाइ ॥८१।। एवं तग्गुणगउरवखित्तमणा उवचरेइ तं न तहा। नियसोहग्गप्पायणहेउं सा अन्नया नीया ।।८२।। नियविन्नाणस्स य दंसणत्थमावाससोगवणियाए। आरोवियधणुदंडो अंबगपिंडीइ कंडाणि ।।८३॥ अणुपुंखं लायंतो ता खिवइ जाव नियकरभासं । आणीया खिविऊणं छिन्ना सा अद्धचंदेण ।।८४॥ सा भणई सिक्खियरसेह दुक्करं किं व पेच्छसिमंपि । नट्टविहिं तो सरिसवरासिट्रियसूइयग्गेस ।।८५।। ॥१७४।।
SR No.600268
Book TitleUpdeshpad Mahagranth Satik Part 01
Original Sutra AuthorJinendrasuri
Author
PublisherHarshpushpamrut Jain Granthmala
Publication Year1989
Total Pages438
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size8 MB
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