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________________ कथासंग्रहः ॥श्रीअञ्जनाXX सुन्दरीचरित्रम् ॥ ॥ अहम् ॥ श्री शंखेश्वर पाश्वनाथाय नमः। ॥श्री प्रेम-भुवनभानु-पद्य-हेमचंद्र सद्गुरुभ्यो नमः ।। परमपूज्य विधवन्दनीय तपोनिधि निष्कलङ्क चारित्रचूडामणि सकलसंवेगीशिरोमणि तपागच्छाधिपति श्रीमत्पन्यासप्रवर श्रीदयाविमलगणिवर सद्गुरुभ्यो नमोनमः॥ ॥ परमपूज्य सकल सिद्धान्तवाचस्पति अनेकसंस्कृतग्रन्थप्रणेता श्रीमत्पन्यासप्रवर श्रीमुक्तिविमलगणिवर विरचितम् ।। ॥१॥ ॥ श्री अञ्जनासुन्दरीचरित्रम् ॥ ॥तत्रादी मङ्गलानि॥ विश्वम्भरोभवभवान्तरबन्धभेदी । मारादिवैरिगुरुवारनिवारणेशः ॥ आद्यो जिनो मुनिरनन्तउदारधामा । नाभीश तात इह वः कुशलं विदध्यात् ॥ १॥ रागद्वेषभुजङ्गदष्टनिखिल ॥१॥
SR No.600265
Book TitleJain Katha Sangraha Part 04
Original Sutra AuthorKalyanbodhivijay
Author
PublisherJinshasan Aradhana Trust
Publication Year1998
Total Pages272
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size16 MB
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