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शब्दार्थ |
सूत्र
भावार्थ
गां
र० रथसे सु० अश्व मो० छोडकर तु० अश्वको वि。 नीकालकर द०दर्भका सं० संथारा सं०करके द० दर्भ संथारे पर दु० बैठकर पु० पूर्व तरफ प० पर्यकासन नि० बैठा क० करतल जा० यावत् क० करके {ए० ऐसा व० बोला न० नमस्कार अ० अरिहंत भ० भगवन्तको जा० यावत् सं० प्राप्तको न० नमस्कार स० श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर को आ० आदि क०करने वाले जा०यावत् संप्राप्त करने के का०कामीको थारगं संथारइ २ ता, दव्भसंथारगं दुरूहइ २ प्ता, पुरत्थाभिमुहे सपलियंक निसणे करयल जाव कट्टु एवं वयासी- नमोत्थुणं अरहंताणं भगवंताणं जाव नमोत्थुणं समणस्स भगवओ महावीरस्स आदिगरस्स जाव संपाविउकामस्स, मम धम्मायरियस धम्मो एसयस्स वंदामिणं भगवं तत्थगयं इहगए पासउ मे भगव तत्थगए जाव वंदइ नमंसइ वंदित्ता नमसित्ता एवं वयासी- पुविपिणं मए समणस्स एकान्त में गया. वहां रथ से नीचे उतरकर अश्व छोड दीये. फीर दर्भ का संथारा बनाकर उस पर पूर्वाभिमुख करके पर्यकासन से बैठा और हस्तद्वय जोड़कर मस्तक को आवर्तना देता हुवा ऐसा बोला) कि आरिहंत भगवन्त यावत् मुक्तिको प्राप्त ऐसेको नमस्कार होवो. धर्मकी आदि करनेवाले यावत् मोक्ष प्राप्त करने की इच्छावाले मेरे धर्माचार्य धर्मोपदेशक श्री श्रमण भगवन्त महावीर को नमस्कार होवो. वहां रहे {हुवे आपको मैं वंदना नमस्कार करता हूं. इस तरह वंदना नमस्कार करके ऐसा बोला कि मैंने पहिले श्री
अनुवादक बालकाचा मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
* प्रकाशक- राजाबहादुर
का सुदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
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