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शब्दार्थ जीवित से व० दूर किया॥१३॥त०तब से वह व०वरुण ते० उस पु० पुरुष से गा गाढा प्रहार क. कराया
अशक्तिीवकल अल्बलरहित अवीर्यरहित अ० पुरुषात्कार पराक्रमरहित अ० नहीं धारण करसके ति०ऐसा कर। के तु० अश्व नि ग्रहणकर के र० रथको प० पीछा फीराया र० रथमुशल संग्राम से १० नीकलकर ए०१७...
९६५ एकान्त में अ० जाकर तु० अश्व को नि० ग्रहण कर र० रथको ठ० स्थापकर र० रथसे ५० उतरकर • याओ ववरोवेइ ॥ १३ ॥ तएणं से वरुणे मागनत्तए तेणं पुरिसेणं गाढप्पहारिकए समाणे अत्थामे अबले अवीरिए अपुरिसक्कार परक्कमे अधारणिज मितिकटु, तुरए निगिण्हइ निगिण्हइत्ता, रहं परावत्तेइ रहमुसलाओ संगामाओ पडिनिक्खमइ २ त्ता एगंतमंतं अबक्कमइ २ त्तातुरए निगिण्हइ निगिण्हइ ता रहं ठवेइ ठवेइत्ता रहाओ पच्चोरु
हइ पच्चोरुहइत्ता, रहाओतुरए मोएइ मोएइत्ता तुरए विसजेइ विसज्जेइत्ता, दब्भसं भावार्थ
कर नागनप्तृक को तीक्ष्णं प्रहार किया. इस तरह उप्त पुरुष से तीक्ष्ण प्रहार कराया हुवा वरुण नाग नप्लकने क्राधित बन कर धगधगायमान होता हुवा धनुष्य में धाण रखकर, कर्ण पर्यंत प्रत्यंचा खींचकर
एक ही प्रहार से उस पुरुष को जीवित से पृथक् किया ॥ १३ ॥ अब उस पुरुष से हणाने से वरुण नाग * नप्तृक शक्ति, बल, वीर्य व पुरुषात्कार पराक्रम रहित हुना और अपने शरीर को धारन करने में
अशक्त जानकर अश्व की लगाम ग्रहण की. रथ को पीछा फिराकर स्थमुशल संग्राम में से निकलकर
Hg पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती
१४. सातवा शतकका नववा उद्देशा 930