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शब्दाथ
सूत्र
र अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी
णिक पा. तिलमसादि कियेत सब से वह वरुण ररथमशल सं०संग्राम में उ० आते हवे एपेमा। अ. अभिग्रह अ० ग्रहण किया क. कल्पता है मे मुझे र० रथमुशल मंग्राम में सं० संग्राम करते जे०१ जो पु० पहिला पहने तं० उसको पहनने को अ० अवशेष नोक नहीं क. कल्पे ए. ऐसा अ०१ अभिग्रह अ० ग्रहणकर सं० संग्राम करता ए. एक पुरुष स. सरिखा सं० सरिखीत्वचा वाला समरिखी ९६२ पायच्छित्ते सन्त्रालंकार विभूसिए सण्णद्धबद्ध सकोरिंदमल्लदामं जाव धरिजमाणेणं अणेगगणनायग जाव दूयसंधिवालसहिं संपरिवुडे मजणघराओ पडिनिक्खमइ पडिनिक्खमइत्ता जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला जेणेव चाउग्घटे आसरहे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छइत्ता चाउग्धंटं आसरहं दुरूहइ दुरूहइत्ता, हयगयरह जाव संपरिवुडे महण भइचडग जाव परिक्खित्ते, जेणेव रहमुसले संगामे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छइत्ता रहमुसलं संगामं उयाए तएणं से वरुणे नागनत्तए रहमुसलं संगामं उयाए
समाणे अयमेयारूवं अभिग्गहं अभिगेण्हइ कप्पइ मे रहमुसलं संगामं संगामवगैरह सब कूणिक राजाने जैसा किया वैसा करके सब अलंकार से विभूषित हुवे शरीर पर कवच धारन भी किया और कोरंटक वृक्ष के पुष्पों की माला युक्त छत्र धारण करते हुवे, अनेक गणों के नायक यावत् टूनसंधिपाल सहित मज्जनगृहसे बाहिर नीकले. बाहिर नाकलकरके उपस्थानशाला (दीवानखाना ) में घंट वाला रथकी पास आये और उस में बैठे. रथ में बैठकर अश्वगजादि चतुरंगिनी सेना से परिवृत यावत् ।।
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* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी
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भावार्थ
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