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________________ शब्दार्थ पंचमाङ्ग विवाह पाणत्ति (भगवती ) सूत्र 280 प्ररूपते हैं ब० बहुत अ अन्यतर उ० मोटा सं० संग्राम में अ० सन्मुख प० हणाते का काल के अवसर 4 में का० काल करके अ० किसी दे० देवलोक में दे० देवण्ने उ. उत्पन्न होवे से यह क० कैसे गो०१० गौतम अमैं आरकहताहूं जायावत् प०प्ररूपता है ए०ऐसे खखलु गो० गौतम ते० उसकालते. उस समय वि०विशाला न नगरी हो० थी ववर्णन युक्त त० तहां वे विशाला न० नगरी में व वरुण ना नाम का ना० नाग का न. पौत्र व रहता है अ ऋद्धिवाला जा. यावत् अ. अपराभूत स० श्रमणापासक अ. पहयासमाणा कालमासे कालंकिच्चा अण्णयरेसु देवलोएसु देवत्ताए उववत्तारो भवंति, से कहमेयं भंते ! एवं? गोयमा ! जेणं से बहुजनो अण्णामपणस्स एवं आइक्खंति जाव उववत्तारा भवंति जे ते एव माहंसु मिच्छंते एवमाहेसु अहंपुण गोयमा! एव माइक्खामि जाव परूवेमि एवं खलु गोयमा ! तेणं कालेणं तेणंसमएणं वेसालीनाम नगरी होत्था ।वण्णओ तत्थणं वेसालीए नगरीए वरुणे नामं नागनत्तुए परिवसइ, अड्डे जाव कर के किसी देवलोका उत्पन्न होते हैं. अहो भगवन् ! यह किस तरह है ? अहो गौतम ! जोई ऐसा कहते हैं उन का कथन मिथ्या है. परंतु मैं ऐसा कहता हूं यावत् प्ररूपता हूं कि उस काल उस समय में विशाला नामक नगरी थी. उस का वर्णन उववाइ सूत्र जैसा करना. उस विशाला नगरी में वरुण नामक नागका पौत्र रहता था. वह बहुत ऋद्धिवंत यावत् अपराभूत था. वह जीव अजीव का सातवा शतक का नया उद्देशा 9884 भावार्थ (
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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