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शब्दार्थ
गौतम च० चौरासी ज• मनुष्य स लक्ष व हनाये ते वे भ० भगवन् म० मनुष्य नि० निःशील जा०३: यावत् नि प्रत्याख्यान रहित पो० पोषध उ० उपवाम सं० रुष्ट प० कुपित स० समर में व. हनाये अ. अनुपांत का काल के अवसर में का० काल कर के कर कहां ग० गये उ० उत्पन्न हुने गो० गौतम उ० प्राय: न० नरक तिकतिर्यंच जो० योनि में उ० उत्पन्न हवे ॥ ७॥ ण विशेष भू० भूतानेन्द्र ह. हस्तिराजा जा० यावत् र० रथमुशल सं० संग्राम को उ० आये पु० आगे स० शक्र दे० देवेन्द्र एक ऐसे
12 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मनि श्रा अमोलक ऋषिजी 202
तेणं भंते ! मणुया निस्सीला जाव निपच्चक्खाण पोसहोववासा संरुट्ठा परिकुविया समरवहिया अणुवसंता कालमासे कालंकिच्चा कहिं गया कहिं उबवण्णा ? गोयमा ! उस्सण्णं नरगतिरिक्ख जोणिएसुउववण्णा ॥ ७ ॥ णाय मेयं अरहथा, सुयमेयं
अरहया, विण्णाय मेयं अरहया रहमुसलेणं संगामे । रहमुसलेणं भंते! संगामे वदृमाणे मनुष्य मारे गये. अहो भगवन् ! शील रहित यावत् प्रत्याख्यान, पौषधोपवास रहित, व कृद्ध, संग्राम में हणाये हुवे काल के अवसर में काल करके कहां गये व कहां उत्पन्न हुवे? अहो गौतम ! प्रायः काल करके नरक व तिर्यंच योनि में उत्पन्न हुवे ॥७॥ यह महाशिला कंटक संग्राम का कथन किया अब रथ मुशल संग्राम का कथन करते हैं. रथमुशलसंग्राम अरिहंतने जाना है, सना है व विशेष प्रकार से
.प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी*
भावार्थ