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शब्दार्थ
48-48 पंचांग विवाह पण्णन्ति ( भवगती)
निपुण आ. आचार्य उ० उपदेश म० मतिकल्पना विक विकल्प से मु. अच्छे निपुण से ए. ऐसे ज. जैसे उ० उवाई में भी भयंकर सं० संग्राम योग्य अ० अयोध्य उ० उदायी ह० हस्ती को म० सज्ज किया ह.अश्व ग० गज र रथ जा०यावत् स०सज्ज कर जे०जहां कूकूणिकराजा ते. तहां उ० आकर क०
९४९ करतल प० जोडकर जा. यावत् कू० कूणिक र० राजा को तक उनकी आ. आज्ञा प० पीछी देदी॥३॥ त० तब से वह कू० कूणिकराजा जे० जहां म० स्नान स्थान त० तहां उ० आकर म० स्नान स्थान में
णेहिं एवं जहा उववाइए, जाव भीमं संगामियं अओझं उदाई हत्थिराय पडिकप्पति, हयगयरह जाव सण्णाहेइत्ता जेणव कृणिए राया, तेणेव उवागच्छंति २त्ता करयलपरिग्गहियं जाव कणियस्स रण्णो तमाणत्तियं पञ्चप्पिणति ॥ ३ ॥ तएणं से
कूणिए राया जेणेव मजणघरे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छइत्ता, मजणघरं अणुपइस तरह विनय पूर्वक आज्ञा धारन करके शीघ्रही आचार्य के उपदेश से, अथवा अपनी पतिकल्पनावाले निपुण आदेशकारी पुरुषोंने रौद्र, संग्राम योग्य व अयोध्य ( उसके समान कोई युद्ध करने वाला | नहीं वैसा ) उदाइ नामक प्रधान हस्ती को सज्ज किया और अश्व गज रथ वगैरह चतुरंगणी सेना भी। तैयार की. इस तरह कार्य करके आदेशकारी पुरुषों काणक राजा की पास आये और हस्तद्वय जोड कर } उन को आजा पाछी दे दी ॥ ३ ॥ फीर कणिक राजा स्नान के स्थान ( मजन गृह ) में गये. वहां स्नान +1
४१. सातवा शतक का नववा उद्देशा
भावार्थ