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कथा :सहित अपने मातामह चेटक नामक राजा की पास वैशाली नगरी में चलेगये. कूणिकने दूत भेजकर
कहलाया कि मेरे दोनों भ्राताओं को भेजो. यदि भेजना न होवे तो युद्ध के लिये सज्जहोवो. चेटकने कह लाया कि जैसे अन्य दश भाइयों को राज्य का विभाग करके दिया है वैसे ही इन को दो और तुम हाथी
हार ले लो. कूणिकने यह बात मान्य की नहीं और अग्यारह भाइयों की तेत्तीस सहस्र अश्व, तत्तीस सहस्र गज, तेचीस सहस्र रथ व तेत्तीस क्रोड पायदल की सेना लेकर चेटक राजाकी सामने युद्ध " करने को आया. चेटक राजा, मल्लदेश के नवराजा व लेच्छदेश के नवराजा यों गुन्नीस कराजाओं सत्तावन २ सहस्र गज, अश्व, रथ व सत्तावन क्रोड पायदल साहत रणक्षेत्र में युद्ध के
लिये आये. कणिक राजा का सैन्यने गरुड व्यूह और चेटक राजका सैन्यने सागर व्यूह बनाया.' राजा व्रतवाला होने से दिनमें मात्र एक ही बाण मारताथा, परंतु उन का बाण अमोघ था. प्रथम दिन
में काल नामक दंडनायक को अपने बाण के प्रहार से मारडाला और उस से कणिक का सैन्य में नाश E भाग हुई. इस तरह दश दिन में चेटकने उन के काल आदि दश भाईयों को मारडाले, अग्यारहवे दिन
चेटक राजा पर विजय करने के लिये कूणिकने अष्टम भक्त तप अंगीकार किया इस से शक्रेन्द्र व चमरेन्द्र दोनों इन्द्रों उन की पास आये. उन में से शक्र बोला कि अहो कृणिक ! चेटक राजा श्रावक है इससे मैं उन को नहीं मार सकता हूं. परंतु तुम्हारा रक्षण करूंगा. ऐसा कहकर उन की रक्षा के लिये बज्र जैसा एक अभेद्य कवच बनाया. और चमरने महाशिलाकण्टक व रथमूशल ऐसे दो संग्राम का
१ अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक
मुखदेवसहायजी ज्वालामसादनी *