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शब्दार्थ
48 अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी
यावत् १० परिपूर्ण अ० होवो ॥१॥ से. अथ भं भगवन् ह० हस्ति का कुं० कुथु का स० सारखा जी० जीव हं ० हां गो• गौतम ६० हस्ति कुं० कुंथु का एक ऐसे ज० जैसे रा० रायप्रसेणी में जा. जावत् खु० क्षुद्र म० महान से वह ते० इमलिये गो० गौतम जा० यावत् स. सरिखा ॥ २ ॥ नेनारकी भ० भगवन् पा० पापकर्म जेल जा कर किये क० करते हैं का करेंगे स. सर्व ते वे दु. दुःख जे. जो नि० निर्जरे से वह सु० सुख हं० हो गो गौतम ने० नारकी पा० पापकर्म जा. यावत् सु० सुख
चउत्थे उद्देसए तहा माणियव्वं ॥ जाव अलमत्थु ॥ १॥ से णूणं भंते ! हथिस्सय
कुंथुस्सय समे चैव जीवे ?हता गोयमा ! हत्थिस्सय कुंथुस्सय एवं जहा रायप्पसेणइ. है जे, जाव खुड्डियंवा महालियंवा सेतेणटेणं गोयमा ! जाव सभे चेव ॥२॥ नेरइयाण ,
भंते! पावे कम्मे जेय कडे जेय कजइ जेय कजिस्सइ सन्चे सेदुक्खे जे निजिण्णे से सुहे? चतुर्य उद्देशे असे कहना ॥ १॥ अव जीव का अधिकार कहते हैं. अहो भगवन् ! क्या हस्ती का व कुंथु का जीव समान है ? हां गौतम ! हस्ती व कुंय का जीव समान है. इस का वर्णन रायप्रसेणी सूत्रों से जानना ॥ २॥ अहो भगवन् ! नरक के जीवोंने जो पापकर्म किये हैं, करते हैं, व करेंगे उन सब को क्या दुःख के हेतुभूत जानना, और जिन पापकर्मोकी निर्जग की, करते हैं व करेंगे उन को क्या से सुख के हेतुभूत जानना ? हां गौतम ! नारकीने जो पाप कर्मों किये, करते हैं व करेंगे वे सब
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी मालाप्रसादजी.
भावार्थ