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शब्दार्थ कि० करे अ० यथा मूत्र रि० चलता है ते० इसलिये गो० गौतम जा. यावत् नो० नहीं सं० सांपरायिक
क्रिया क° करे ॥ १ ॥२॥ ३ ॥ ४ ॥ ५ ॥ छ० छद्मस्थ भं० भगवन् म० मनुष्य जे० जो भ० भव्य
अजीवाणं भोगा ॥ कइविहाणं भंते भोगा पण्णत्ता ? गोयमा ! तिविहा भोगा पण्णत्ता, तंजहा-गंधा, रसा, फासा ॥ ३ ॥ कइविहाणं भंते ! कामभोगा पण्णत्ता ? गोयमा ! पंचविहा कामभोगा पण्णत्ता तंजहा सदा रूवा, गंधा, रसा, फासा ॥ ४ ॥ जीवाणं भंते ! किं कामी भोगी ? गोयमा ! जीवा कामीवि भोगीवि
से केण?णं भंते ! एवं बुच्चइ जीवा कामीवि भोगीवि ? गोयमा ! सोइंदिय भावाथ
अचित्त भी हैं. अहो भगवन् ! क्या जीव काम है या अजीव काम है ? अहो गौतम ! शरीर व रूपकी अपेक्षा से जीव काम हैं और शब्द की अपेक्षा से अजीव भी काम हैं. अहो भगवन ! क्या जीवों को काम होवे या अजीवों को काम होवे ? अहो गौतम! जीवों को काम होवे परंतु अजीवों को काम नहीं होवे ? अहो भगवन् ! काम के कितने भेद ? अहो गौतम काम के दो भेद शब्द व रूप ॥२॥ अहो भगवन् ! क्या भोग रूपी हैं या अरूपी हैं? अहो गौतम ! भोग रूपी हैं परंतु अरूपी नहीं हैं.
अहो भगवन् ! क्या भोग सचित्त हैं या आचित्त हैं ? अहो गौतम ! भोग सचित्त भी है और अचित्त 1 भी है. संज्ञी जीव व शरीर संबंधी भोम सचित्त व असंज्ञी के अचित्त. अहो गवन् ! क्या जीव भोग हैं
पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती ) सूत्र -8283
१४-888 सातवा शतक का सातवा उद्देशा
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