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शब्दार्थ
ऋषिजी
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* अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक
सै० संवृत भ० भगवन् अ० अनगार आ० उपयोग से ग जाते चि० खडे रहते नि० कैते ३० वस्त्र: ५० पात्र के० कंबल पा रजोहरण ग• लेते नि० रखते किं. क्या ई० ईपिथिक कि० क्रिया क करे
संवुडणं भंते ! अणगारस्स आउत्तं गच्छमाणस्स आउत्तं चिट्ठमाणस्स आउत्तं । निसीयमाणस्स आउ वत्थ पडिग्गहं कंबलं पायपुच्छण गेण्हमाणस्सवा, निक्खिन माणस्सवातस्सणं भंते! कि ईरियावहिया किरिया कजइ संपराइया किरिया कजइ?गोयमा! संयुडस्सणं अणगारस्स आव तस्सणं ईरियावाहिया किरिया कनइ, नोसंपराइया किरिया
कजइ ॥ सेकेणद्वेणं भंते ! एवं ग्रुच्चइ संवुडस्सणं जाव नो संपराइया किरिमा कजइ ? _ छे उद्देशे के अंत में नरक में असंवरी की उत्पत्ति का कहा. अब उस से विपरीत संवृत अनगार का मो होता है सो कहते हैं, अहो भगवन् ! इन्द्रियों को संयम में रखनेवाले अनगार को उपयोग सहित, जाते, बैठते, सोते, व वस्त्र, पात्र कंबल रजोहरणादि लेते व रखते क्या ईपिथिक क्रिया लगे या सांपरायिक क्रिया लग ? अहो गोलन सडत अनगार को उपयोग सहित, बैठते, उठते, सोते, व वखात्रादि व लेते रखते ईयापिथक क्रिया लगती है परंतु सपिरायिक क्रिया नहीं लगती है. अहो भमवन् ! संवृत अनगार को किस कारन से ईर्यापथिक क्रिया लगती है व सांपरायिक क्रिया नहीं लगती है ? अहो गौतम ! जिन , को क्रोध, मान माया,व लोभ,नष्ट हुवे हैं उन को ईर्यापथिक क्रिया लगती है. उस क्रिया को ये प्रथम समय *
.प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखद तावजी ज्वालाप्रसादजी *
भावार्थ