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शब्दार्थ
सूत्र
भावार्थ
१० अनुवादक बालब्रह्मचारि।मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
{ अतिक्रमण में प० प्रधान अ० अकार्य में नि०. नित्य उ० उद्यत गु० गुरु में वि० विनय र० रहित वि० विकलरूप प० बढेहुवे न० नख के० केश मं० दाढी रो०रोम का० कालेवर्ण वाले खअतीव फ० परुष झा० अनुज्लवर्णवाले फु० खल्लेशिर वाले क० कपिल १० पलित केशवाले व० बहुत पहा • स्नायु, स० नीकले हुवे दु० दु:ख से देखने योग्य रू० रूपवाले सं० मंकुचित व० बलि त० तरंग १० परिवेष्ठित अं० अंग पविरल परिसडिय दंतसेढी उभडघडमुहा, विसमनयणा, बँकनासा, वकवलिविगय भेसणमुहा, कच्छुकसिराभिभूया, खरतिक्ख नह कंडूइय विकयतणू, दद्दुकिडिभसिंभफुडिय फरुसच्छ विचित्तलंगा, टोलगति विसम संधि बंण उक्कुडुयाय विभत्त दुव्वा कुसंघयण कुप्पमाण कुसंठिया कुरुवा कुट्ठाणासण कुसेज कुभोइणो, असुइणो अणेगवाहिपरिपीलियंगमंगा, खलंतविग्भलगई, निरुच्छाह सत्त परिवज्जिय विगय चिट्ठआसक्त, मर्यादा उल्लंघनेवाले अकार्य करनेवाले, गुरु आदि पूज्य जनों का विनय रहित, विकलरूपवाले, बढे हुवे नख, केश, श्मश्रु रोमवाले, काले वर्णवाले, अतीव कठोर अनुज्वल वर्णवाले, बिखरे हुवे बालवाले, पलित केशवाले, बहुत नसों व नाडीयों दीखने मे दुर्दर्शनीय, संकुचित. अनेक प्रकार के लक्षणों से परिवेष्टित अंगवाले, वृद्ध समान स्थविर, दंत नहीं होने से अथवा किसी दंत के गिरने से विकराल घट के मुख समान, विषम नेत्रवाले, व वक्र नासिकावाले होंगे. उन के शरीर के अवयंत्र वक्र भयंकर पामखसर
* प्रकाशक - राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी बालाप्रसादजी *
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