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शब्दार्थ
पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र
भ०भगवन् जी० जीव सा० साता वेदनीय क० कर्म क० करे हैं. हां क० कैसे गो गौतम पा० प्राण की अनुकंपा से भू० भूत की अनुकंपा से जी० जीव की अनुकंपा से स० सत्व की अनुकंपा से ब० बहुत क्कसवेयाणिज्जा कम्मा कजति ॥ अत्थिणं भंते ! नेरइयाणं अककसवेयाणिजा कम्माकजंति ? णो इणटे समटे, एवं आव वेमाणियाणं ॥ गवरं मणुस्साणं जं जीवाणं॥८॥ अत्थिणं भंते ! जीवाणं सायावेयणिजा कम्मा कति? हंता अस्थि ॥ कहण्णं भंते ! सायावेयणिज्जा कम्मा कजंति ? गोयमा ! पाणाणुकंपयाए, भूयाणुकंपयाए, जीवाणु कंपयाए, सत्ताणुकंपयाए, बहूर्ण पाणाणं जाव सत्ताणं अदुक्खणयाए असोयणयाए
अजरणयाए, अतिप्पणयाए, अपिट्टणयाए, अपरियावणयाए, एवं खलु गोयमा ! नारकी अकर्कश वेदनीय कर्म करते हैं ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं हैं. मात्र मनुष्य अकर्कश वेदनीय कर्म करते हैं शेष सब दंडकवाले कर्कश वेदनीय कर्म करते हैं ॥ ८ ॥ अहो भगवन् ! क्या जीव साता वेदनीय कर्म करे ? हां गौतम ! जीव साता वेदनीय कर्म करे. अहो भगवन् ! जीव कैसे साता वेदनीय कर्म करे ! अहो गौतम :. प्राण, भूत, जीव व सत्व की अनुकंपा करने से वैसे ही बहुत प्राण, भूत, जीव व सत्व को दुःख नहीं देने से, दैन्यपना उत्पन्न नहीं करने से, शोक उत्पन्न नहीं करने से, शोक से अश्रु आदि नहीं गिराने से, यष्टयादि से ताडन नहीं करने से, व परिताप नहीं उपजाने से जीव
888800 सातवा शतकका छठा उद्देशा
भावार्थ