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शब्दार्थ
१.१ अनुबादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषीजी
कैसे गो० गौतम पा० प्राणापात से जा० यात् मि० मिथ्या दर्शन शल्य से ॥ ७ ॥ पूर्ववत् ।। ८ ॥
ककसवेयणिज्जा कमा कति ? हंता अत्थि ॥ कहण्णं भंते! जीवाणं कक्कसवेयणिज्जा कम्माकजंति ? गोयमा ! पाणाइवाएणं जाव मिच्छादसणसल्लेणं, एवं खलु गोयमा ! जीवाणं ककसवयणिज्जा कम्माकजति ॥ अत्थिणं भंते ! नेरइयाणं ककसवेयाणिज्जा कम्मा कजति ? गोयमा ! एवं जाव वेमाणियाणं ॥ ७ ॥ अत्थिणं भंते ! जीवाणं अककसवेयणिज्जा कम्मा कति? हंता अस्थि । कहाण्णं भंते ! जीवाणं अकक्कसवेय. णिजा कम्मा कजंति ? गोयमा ! पाणाइवायवेरमणेणं जाव परिग्गहवेरमणेणं,
कोहविवेगणं जाव मिच्छादसणसलविवेगेणं ॥ एवं खलु गोयमा ! जीवाणं अककरते हैं ? हां गौतम ! जीव कर्कश वेदनीय कर्म करते हैं. अहो भगवन् ! जीव कैसे कर्कश वेदनीय कर्म करते हैं ? अहो गौतम ! प्राणातिपात यावत् मिथ्यादर्शनशल्य करने से जीव कर्कश वेदनीय कर्म करते हैं. ऐसे ही नारकी आदि चौवीस ही दंडक का जानना ॥ ७॥ अहो भगवन् ! क्या जीव अकर्कश वेदनीय कर्म करते हैं ? हां गौतम ! अहो भगवन् ! जीव कैसे अकर्कश वेदनीय कर्म करते हैं ? अहो गौतम ! प्राणातिपात से निवर्तने से यावत् परिग्रह से निवर्तने से, वैसे ही क्रोध यावत् मिथ्या दर्शन शल्य का त्याग करने से जीव अकर्कश वेदनीय कर्म करते हैं. अहो भगवन् ! क्या 61
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी &
भावार्थ
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