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शब्दार्थ
+ अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
स० शरद ऋतु में त० पीछे हे० हेमन्त में त० पीछे व० वसन्त में त० पीछे गि० ग्रीष्म में व० वनस्प
काया स० सर्व से अल्पाहारी भा होती हैं ॥१॥ ज० यदि भ० भगवन गि० ग्रीष्म ऋतु में वनस्पति काया स० सर्व मे अल्पाहारी भ० होती है क० कैसे भ० भगवन् गि० ग्रीष्म में ब. बहुत ३० वनस्पति काया प० पत्र पु० पुष्प फ फल से ह. हरितरंग से रे० देदीनप्त सि वनलक्ष्मी से अ० अतीव उ• मुशोभत उ० रहती है गो० गौतम गि० ग्रीष्म में ब० बहुत उ० ऊष्णयोनिवाले जी जीव
तयाणतरंचणं सरए, तयाणतरं च णं हेमंते, तयाणंतरं च णं वसंते, तयाणतरं च णं गिम्हासुणं, वणस्सइकाइया सव्वप्पाहारगा भवति ॥ १॥ जइणं भंते ! गिम्हासु वणस्सइ काइया सव्वप्पहारगा भवंति कम्हाणं भंते ! गिम्हासु बहवे वणस्सइकाइया पत्तिया पुष्फिया फलिया हरियगारेरिजमाणा सिरीए अतीव २ उवसोभेमाणा
उचिटुंति ? गोयमा ! गिम्हासुणं बहवे ऊसिणजोणिया जीवाय पोग्गलाय वणस्सइ अनुक्रम से शरद, हेमन्त, सन्त व ग्रीष्मऋतु में अल्प आहार करनेवाले होवे ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! जब वनस्पतिकायिक जीवों ग्रीष्मऋतु अल्प आहार करनेवाले हैं तब किस कारनसे ग्रष्मिऋतु में वनस्पतिकायिक जीव । पत्रान्त, पुष्पवन्त, नीले वर्ग से देदीप्यमान और वनस्पति की. श्री से बहुत सुशोभित होवे ? अहोई , गौतम ! ग्रीष्मऋतु में कृष्ण योनिवाले बहुत जीव र पुद्गल वनस्पतिकायपने उत्पन्न होते हैं, व चवते हैं."
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवमहायजी ज्यालामतादजी *
NAADARSindi
भावार्थ