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शब्दार्थ |
सूत्र
* पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र
भावार्थ |
{रहित अ० डाले नहीं अ० गाडी की धूरी अ० अनुलेप अ० अनुभूत सं० संयमयात्रा मा०मात्रा सं० संयम भा० भार वहन के लिये वि० बिल में प० सर्प जैसे अ० आत्मा से आ० आहारकरे ए० उमको गो० गौतम ॥७७॥१॥ से० वह भं० भगवन् स० सर्व प्राण स० सर्व भूत स० सर्व जीव स०सर्व सत्व से प-प्रत्याख्यान व० {बोलते को सु० सुप्रत्याख्यान भ० होवे दु० दु:प्रत्याख्यान भ० होवे गो० गौतम ज० जिसको स० सर्व यस जाव पाणभोयणस्स अयमट्ठे पण्णत्ते ॥ तंचेव ॥ सेवं भंते भंतेत्ति | सत्तमे स पढमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ ७ ॥ १ ॥
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44-4 सातवा शतक का दूसरा उद्देशा
सेणू भंते ! सव्वपाणेहिं, सव्वभूएहिं सव्वजीवेहिं सव्वसत्तेहिं, पच्चक्खायमिति वदमाणस्स सुपच्चक्खायं भवइ तहा दुपच्चक्खायं ? गोयमा ! सव्व पाणेहिं जाव सव्व सत्तेहिं वहकर के लिये सर्प बिल में प्रवेश करे उस समान आहार करे, तब उसे शस्त्रातीत, शस्त्र परिणमित यावत्) { मामुदानिक आहार कहते है. अहो गौतम ! शस्त्रातीत यावत् सामुदानिक आहार का यह अर्थ कहा. यह सातवा शतक का पहिला उद्देशा पूर्ण हुवा ॥ ७ ॥ १ ॥
प्रथम उद्देशे में निर्दोष आहार की वक्तव्यता कहीं वह प्रत्याख्यान पूर्वक होती है इसलिये प्रत्याख्यान } re का प्रश्न पूछते हैं. अहो भगवन् ! सब प्राण, भूत, जीव व सत्व में प्रत्याख्यान है ऐसा कहनेवाले को सुप्रत्याख्यान होवे या दु:प्रत्याख्यान होवे ? अहो गौतम ! सब प्राण, भूत, जीव व सत्व में प्रत्याख्यान
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