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शब्दार्थ | १० उस को स० इंगाल सहित पा० पान भो० भोजन जे० जो निः साधु नि० साची फा० फासक
ए० शुद्ध अ० अशन पा० पान खा. खादिम सा० स्वादिम प० लेकर म० बडा अ० प्रीति रहित को क्रोध कि०किलामना क०करता आ० आहार आ० आहारकर ए. यह गो० गौतम स० धूम्रसहित पा०पान। भोक भोजन जे. जो नि० साधु नि. साध्वी जाः यावत् प० लेकर गु० गुण उ० उत्पादकहेतु अ. अन्य द्रव्य स. साथ सं० मीलाकर आ० आहार करे ए. यह गो. गौतम सं० संयोजना दो दोष द. दुष्ट पा० पान भो० भोजन ॥ १२ ॥ वी. इंगाल रहित वी० धम्ररहित मं० संयोजना
एसाणिज्जं असणपाणखाइमसाइमेणं पडिग्ग हेत्ता महया अप्पत्तिय कोह किलामं करेमाणे आहार माहारेइ, एसणं गोयमा ! सधूमे पाणभोयणे । जेणं निग्गंथवा जाव पडिग्गाहेत्ता गुणुप्पायणहउँ अण्णदव्वेणं साई संजोएत्ता आहार माहारेइ, एसणं गोयमा संजोयणा दोस? पाणभोयणे ॥ एएणं गोयमा ! सइंगालस्स सधृमस्स संजोयणा
दोसदुट्ठस्स पाणभोयणस्स अट्ठे पण्णत्ते ॥१२॥ अह भंते ! वीइंगालस्स वीयधूमभावार्थ एषणिक आहारादिक ग्रहण करके अप्रीति, क्रोध व किलामना करते आहार करे तो उस को धूम्रदोष ? ४०
लगता है, जो साधु साधी फासुक व एषणिक अशनादि ग्रहण करके स्वादिष्टपना का गुण बनाने के लिये
उस में अन्य द्रव्य मीला कर आहार करे उस को संजोयना दोष लगता है. अहो गौतम ! यह इंगाल, धूम्र, .७ 12व संजोयना दोष का अधिकार कहा ॥ १२ ॥ अहो भगवन् ! इंगाल, धूम्र व संजोयना दोप रहित आहार है।
पंचमान विवाह पण्णति (भगाती):
सातवा शतक का पहिला उद्देशाने