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शब्दार्थ प्रयोग से अ० कर्म रहित की ग० गति प० होती है एक ऐसे गो० गौतम नि० संगरहित नि० रंग
रहित जायावत् पु० पूर्व प्रयोग से अ० अकर्म की गगति होती है॥२॥दु दुःखी भं भगवन् दु० दुःखसे फु०स्पर्श अ० अदुःखी दु०दुःखले फु० स्पर्श गोगौतम दु०दुःख से फु० म्पर्शे नो० नहीं अ० अदुःखी दु० दुःख
८७३ सत्र
एवं खलु गोयमा । पुव्वप्पओगेणं अकम्मस्स गई पवत्तइ ॥ एवं खलु गोयमा ! निसंगयाए निरंगणयाए जाव पुचप्पओगेणं, अकम्मस्स गई पवत्तइ ॥९॥ दुक्खी भंते ! दुक्खेणं फुडे अदुक्खी दुक्खेणं फुडे ? गोयमा ! दुक्खी दुक्खण फुडे नो अदुक्खी दुक्खेणं फुडे ॥ दुक्खी भंते ! नरइए दुखेणं फुडे अदुक्खी नेरइए दुक्खेणं फुडे ? गोयमा ! दक्खी नेरइए दक्खणं फडे नो अदक्खी नेरइए दुक्खणं
फुडे एवं दंडओ जाव वैमाणियाणं, एवं पंच दंडगा नेयव्वा ॥ दुक्खी भावार्थ जैसे धनुष्य पर से नीकला हुवा बाण की निर्व्याघातपने लक्ष्य की तरफ गति होती है वैसे ही पूर्व प्रयोग
से कर्म रहित जीव की गति होती है. इसी कारन से अहो गौतम ! संग, मोह नहीं होने से यावत प्रयोग से कर्म रहित जीव की गति होती है ॥ ९ ॥ जो कर्म रहित नहीं होता है वह दुःख से स्पर्शता है . इमलिये दुःख का प्रश्न पूछते हैं. अहो भगवन् ! क्या दुःखी (कर्म सहित ) जीव दुःख (कर्म से) ॐ स्पर्शता है अथवा अदुःखी [ कर्म रहित ] जीव दुःख से स्पर्शता है ? अहो गौतम ! दुःखी जीव ही 20 3. दुःख से स्पर्शता है परंतु अदुःखी जीव दुःख से नहीं स्पर्शता है. अहो भगवन् ! दुःखी नारकी दुःख से है।
विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र -<38**
8080सातवा शतकका पहिला उद्देशा 88488