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शब्दार्थ १५० जानते हैं हं० हां अ० है क कैसे भं• भगवन् अ. अर्भवाले की ग० गति प० जानी जाती है ।
1. गौतम नि० संगरहित निः रंगरहित ग० गतिस्वभाव से बं० बंधन छेदन से नि० इंधन सहित पु०१० ॐ पूर्वप्रयोग से अ. अकर्म की ग० गति प० जानी जाती है क कैसे भ भगवन् निसंगरहित नि० रंगरहित
ग. गतिस्वभाव से अ. अकर्म की ग. गति १० जानी जाती है गो० गौतम से वह जे. जैसे के. कोई पुरुष मु० शुष्क तुं० तुंबा नि० छिद्ररहित नि० आघात रहित. आ० अनुक्रम से ५० संस्कार कराया
हंता अत्थि ॥ कहणं भंते ! अकम्मस्स गई पण्णायइ ? गोयमा ! निस्संगयाए
निरंगणयाए, गइपरिणामेणं, बंधणच्छेयणयाए, निरिंधणयाए, पुवप्पयोगेण, अक} म्मस्स, गई पण्णायइ ॥ कहणं भंते ! निस्संगयाए निरंगणयाए, गइपरिणामेण,
अकम्मस्स गई पण्णायइ ? गोयमा ! से जहा नामए केइ पुरिसे सुक्कं तुंबं निच्छिदं
निरुवहयं आणुपुवीए परिकम्ममाणे २ दब्भेहिय, कुसेहिय, वेढेइ, अट्ठहिं मट्टिया भावार्थ इमलिये मुक्ति का प्रश्न करते हैं. अहो भगवन् ! कर्म रहित जीव की क्या गति है ? हां गौतम ! कर्म
रहित जीव की गति है. अहो भगवन् ! कर्म रहित जीव की कैसे गति होती है ? अहो गौतम ! संग नहीं
होने से, मोह नहीं होने से, गति पारणाम से, बंध का छेद करने से, एरंड बीज समान कर्म इंधन रहित 19 होने से व पूर्व प्रयोग ऐसे छ कारनों से कर्म रहित जीव की गति है. अहो भगवन् ! संम, मोह नहीं है
80 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) मूत्र 898
> सातत्रा शतकका पहिला उद्दशा