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________________ शब्दार्थ त० उस को नो नहीं इ० ईर्यापरिक क्रिया क. करे सं. सांपयिक क्रिया क. करे ॥ ४ ॥ स./ श्रमणोपासक को भे० भगवन् पु. पहिले त त्रस प्राण का स० समारंभ का ५० प्रत्याख्यान भ० होने पृथ्वी का स० समारंभ में अ० अप्रत्याख्यान भ० होने से वह पु० पृथ्वी को ख० खौदर हुवा अ० किसी त. सप्राणी को वि० हणे से उन को भ० भगवन् तं. उस व्रत में अ० मतिः नो० नहीं इ० यह अर्थ स० योग्य नो० नहीं त• उन का अ० अतिपात में आ० वर्तता है।५॥पूर्ववत्॥६॥ याहिगरणवत्तियं च णं तस्स नो ईरियावहिया किरिया कजइ, संपराइया किरिया कजइ से तेणट्रेणं॥४॥ समणोवासगस्सणं भंते ! पुवामेव तसपाणसमारंभे पञ्चक्खाए भवइ, 1 पुढवि समारंभे अपच्चक्खाए भवइ सेय पुढविं खणमाणे अण्णयरं तसं पाणं विहिंसेज्जा, सेणं भंते !तं बर्य अइचरइ ? णोइण? समढे॥ नो खलु से तस्स अइवायाए आउदृइ॥५॥ अधिकरणिकी क्रिया प्रत्यायकी सांपरायिक क्रिया. उस को लगती है परंतु ईर्यापथिक क्रिया नहीं, लगती है. ॥४॥ अहो भगवन् ! श्रावक को प्रसप्राण के समारंभ का प्रत्याख्यान पहिले से ही है परंतु पृथ्वीकायादिक के समारंभ का प्रत्याख्यान नहीं है. यदि पृथ्वीकाय खोदते हुवे श्रावक किसी त्रसप्राणी की हिंसा करे तो क्या वह व्रतभंग करता है ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं है. 14 अर्थात् श्रावक के व्रतका भंग नहीं होता है. क्यों कि उस को प्रसवध का संकल्प नहीं था ॥५॥ श्रावक अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिनी 8 बकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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