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शब्दाथ
बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
साता वे वेदना वे० वेदते हैं आ० अथवा अ० असाता दे. वेदना के वेदे ॥ ७ ॥ ने नारकी भ.. भगवन् जे. जो पो० पुद्गल अ० आत्मा से आ० ग्रहणकर आ० आहार करते हैं ते० वे किं. क्या आ०
सत्ता एगंतसायं वेयणं वेयंति आहच्च असायं वेयणं वेयंति ॥ अत्थेगइया पाणा भूया जीवा सत्ता बेमायाए वेयणं वेयंति, आहच्च सायमसायं ॥ से केणट्रेणं ? गोयमा ! नरइयाणं एगत दुक्खं वेयणं वेयंति, आहच्च सायं।भवणवइ, वाणमंतर, जोइस,वेमाणिया एगत सार्यवेयति,आहच्च असायं। पुढविकाइया जाव मणुस्सा बेमायाए वेयणंवेयंति,आहच्च सायम सायं से तेणटेणं ॥७॥ नेरइयाण भंते ! जे पोग्गला अत्तमायाए आहारंति ते किं.
आयसरीरखेतोगाढे पोग्गले अत्तमायाए आहारंति अणंतर खेतोगाढे पोग्गले परंतु चवण काल में अथवा वज्र प्रहारादि से असाता वेदना वेदते हैं. पृथ्वीकायादि से मनुष्य पर्यंत जीव को मर्यादा रहित वेदना है तथापि क्वचितू साता व क्वचित् असाता ऐसे दोनों प्रकार की वेदना वेदते हैं ॥ ७॥ साता असाता वेदना आहार के पुद्गलों से होती है इसलिये आहार संबंधी प्रश्न करते | हैं अहो भगवन् ! नरक का जीव आहार करने योग्य पुद्गलों को आत्मा से आहारपने ग्रहण करता है वह क्या स्वशरीर क्षेत्र अवगाहित पुद्गलों का आहार करता है, अनंतर क्षेत्र अवगाहित पुद्गलों का आहार करता है अथवा परंपरक्षेत्र अवगाहित पुठूलों का आहार करता है ? अझे गौतम ! नारकी स्वशरीर
..प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी *
भावार्थ