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________________ शब्दार्थ १११ की जी जीव गो० गौतम ॥ ३ ॥ पूर्ववत् ॥ ४-५-६ ॥ अ० अन्यतीथिक भ० भगवन् ए. ऐसा आ भा नेरइए जीवे ? गोयमा नेरइए ताव नियमा जीवे जीवे पुण सिय नेरइए सिग गले. । रइए । जीवेणं भंते ! असुरकुमारे २ जीवे ? गोयमा ! असुरकुन्नर नाव का जीवे जीवे पुण सिय असुरकुमारे सिय णो असुरकुमारे, एवं दंडओ भाणियव्यो वेमाणियाणं ॥ ३ ॥ जीवइ भंते ! जीवे जीवे जीवइ ? गोयमा जीवइ ताव नियमा जीवे जीवे पुण सिय जीवइ सिय नो जीवइ ॥४॥ जीवइ भंते ! नेरइए २ जीवइ ? नारकी है सो जीव है ? अहो गौतम ! नारकी नियमा जीव होती है और जीव नरक में उत्पन्न होता है है तब नारकी होता है और अन्य स्थान उत्पन्न होता है तब नारकी नहीं होता है, इसलिये क्वचित् । नारकी होता है और क्वचित् नारकी नहीं होता है. अहो भगवन् ! क्या जीव असुरकुमार है या असुर कुमार जीव है ? अहो गौतम ! असुरकुमार नियमा जीव है और जीव क्वचिन् असुरकुमार है हैं व क्वचित् नहीं है. ऐसे ही चौवीस दंडक का जानना ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! प्राण धारण करता है | वह जीव है अथवा जीव है वह प्राण धारण करता है ? अहो गौतम ! जो प्राण धारण करता है वह नियमा जीव है, क्योंकि एकेन्द्रियादि प्राण धारण करनेवाला जीव होता है और जो जीव है वह प्राण धारणकरता भी है और नहीं भी करता है क्योंकि जीव संसार अवस्थामें प्राण धारण करता है परंतु सिद्धा-२४ AAAAAAAAmwarPAAN पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 4624 छठा शतक का दशवा उद्दशा 80P भावार्थ
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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