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शब्दार्थ जा० यावत् म० महानुभाग वा बाह्य पो० पुद्गल अ० विनाग्रहण किये प० समर्थ का० काले पो• पुद्गले
देवेणं भंते ! महिड्डीए जाव महाणुभागे, बाहिरए पोग्गले अपरियाइत्ता पभू कालगं पोग्गलं नीलयपोग्गलत्ताए परिणामेत्तए, नीलं पोग्गलंवा कालए पोग्गलत्ताए परिणामेत्तए ? गोयमा ! नो इण? समठे, परियाइत्ता पभू ॥ सेणं भंते ! किं इहगए । पोग्गले तंचेव नवरं परिणामेडत्ति भाणियत्वं । एवं कालगपोग्गलंलोहिय पोग्गलत्ताए एवं कालएणं जाव सुकिल्लं, एवं नीलएणं जाव सुक्किलं । एवं लोहिएणं
जाव सुकिलं. एवं हालिद्दएणं जाव सुकिलं एवं एयाए परिवाडीए गंधरसफास भावामहद्धिक यावत् महानुभाग देव बाहिर के पुद्गल ग्रहण किये बिना काले पुद्गलों को नीले पुद्गलों में
व नीले पुद्गलों को काले में परिणमाने को क्या समर्थ हैं ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं हैं. परंतु बाहिर के पुद्गलों ग्रहण करके काले का नीले में व नीले का काले में परिणमाको को समर्थ है और वह वहां । के ही पुद्गलों ग्रहण कर परिणमाते हैं. जैसे काला नीला का कहा वैसे ही काला व लाल, काला व पाला, और काला व शुक्ल पुदल परिणमाने का जानना. ऐसे ही दो गंध, पांचरस, व आठ स्पर्शका जानना. १ काला नीला, २ काला लाल ३ काला पीला ४ काला श्वत ५ नीला लाल, ६ नीला पीला ७ नीला श्वेत, ८ लाल पीला ९ लाल श्वेत और १० पीला श्वेत यह दश भांगे हुए. ऐसे ही गंध
वारी मुनि श्री अमालक ऋषिजी १ १.१ अनुवादक-बालब्रह्म
*प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी*