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शब्दार्थ
श्री अमोलक ऋषिजी अनुवादक-बालब्रह्मचरािमुनि
बांधे गो० गौतम स० सात बं० बांधे अ० आठ बं० बांधे बं० बंध उ० उद्देशा ने जानना ॥ १॥ दे० देव भ० भगवन् म. महर्दिक जा. यावत् म० महानुभाव बा० बाह्य पो० पुद्गल अ० बिनाग्रहण किये ५० समर्थ ए. एक वर्ण ए. एक रूप वि० विकुर्वणा करने को गो. गौतम नो० नहीं इ० यह अर्थ स० योग्य ॥ २ ॥ दे० देव भ० भगवन् बा० बाह्य पो• पुद्गल प० ग्रहण कर म० समर्थ है. हां प० समर्थ । ___ सत्तविह बंधएवा, अट्टविह बंधएवा, छव्विह बंधएवा, बंधुद्देसो पण्णवणाए नेयव्यो ।
॥ १ ॥ देवेणं भंते! महिड्डीए जाव महाणुभाए बाहिरए पोग्गले, अपरियाइत्ता पभू
एगवणं, एगरूवं विउवित्तए ? गोयमा ! नो इणढे समढे ॥ २ ॥ देवेणं भंते ! करता है ? अहो गौतम ! जीव सात प्रकार की व आठ प्रकार की कर्ममकृतियों का बंध करता है. जब आयुष्य कर्म का बंध नहीं करता है तब सात, आयुष्य कर्म का वध करता है तब आठ, और दशवे गुण स्थान में मोहनीय और आयुष्य दोनों कों का बंध नहीं करता है तब छ कर्म प्रकृतियों का बंध करता है. इस का विशेष अधिकार पनवणा सूत्र के चौवीसवे पद में कहा है ॥ १॥ अहो भगवन् ! महा ऋद्धिवंत यावत् महानुभाग देव वाहिर के पुद्गलों ग्रहण किये बिना क्या एक वर्ण एकरूप (एक सरीखा आकारवाला शरीरादि ) बनाने को क्या समर्थ है ? अहो गौतम ! यह अर्थयोग्य नहीं है. अर्थात् देव इस तरह वैक्रेय बनाने को समर्थ नहीं है ॥ २ ॥ अहो भगवन् ! क्या महर्दिक यावत् महानु ।
*प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी *
भावार्थ
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