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________________ शब्दार्थ | सूत्र ७ भावार्थ २०१९०९ पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र वनस्पति क० कल्प उ० उपरके क० कृष्णराजी में ॥ १० ॥ क० कितने प्रकार का भं० भगवन् आ० इट्ठे समट्ठे, णण्णत्थ विग्गहगइ समावण्णएणं । अत्थिणं भंते ! चंदिम जा तारारूवा ? गायमा ! णो इणट्ठे समट्ठे । अत्थिणं भंते ! गामाइवा जाव सन्निवेसाइवा ? गोयमा ! णो इण्टु समट्ठे ॥ अत्थिणं भंते ! चंदा भाइत्रा ? गोयमा ! नोई समट्टे एवं सणकुमारमा हिंदेसु णवरं देवो एगो पकरेइ ॥ एवं बभलोएत्रि एवं बंभलोगस्स उवारे सव्वहिं देवो पकरेइ पुच्छियव्वोय, बायरे आउकाए, बारे अगणिकाए, बायरे वणस्सइकाए, अण्णं तं चेव गाहा-तमुकाय कप्पपणए, वहां बादर पृथ्वीकाय व बादर अग्निकाय नहीं है परंतु विग्रहगति आश्री वहां जीव मीलते हैं. अहो ( भगवन् ! क्या वहां चंद्र यावत् तारे रहे हुवे है ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं है. अहो भगवन्! ( क्या वहां ग्राम यावत् संन्निवेश हैं ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं है. अहो भगवन् ! क्या सौधर्म { ईशान देवलोक में चंद्रकी कान्ति व सूर्य की कान्ति है ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं है. जैसे सौधर्म ईशान का कहा वैसे ही सनत्कुमार माहेंद्र का जानना. इस में मात्र देवही उपर जासकते हैं। { परंतु असुर व नाग नहीं जासकते हैं, इसलिये मात्र देवही पानी की दृष्टि व शब्द करते हैं. इसी प्रकार ब्रह्म देवलोक से अच्युत देवलोकतक का जानना. बारह देवलोक में मात्र देव दी हैं उपर के देवों वक्रेय नहीं करते हैं इसलिये वहां वैसा शब्द व मेघ नहीं है, पांचवा ब्रह्म देवलोक से उपर के सब विमानों छठा शतक का आठवा उद्देशा 888 ८३९
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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