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________________ शब्दार्थ उ० उद्देशा स० समाप्तं ॥ ६॥७॥ है क. कितनी भ० भगवन् पु० पृथ्वी ५० प्ररूपी गो० गौतम अ० आठ पु. पृथ्वीयों प० कहीं र० रत्न प्रभा जा० यावत् ई० ईपत् प्रागभार ॥ १ ॥ अ० है ० भगवन् इ० इस रं० रत्नप्रभा पु० पृथ्वी की अ० नीचे गे० गृह गे• दुकानों गो. गौतम णो० नहीं इ० यह अर्थ स० समर्थ ॥ २ ॥ अ० है भं०१७ सत्तमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ ६ ॥ ७ ॥ * . कइणं भंते पुढवीओ पण्णत्ताओ ? गोयमा ! अट्ट पुढवीओ पण्णत्ताओ, तंजहारयणप्पभा जाव ईसिप्पभारा ॥ १ ॥ अत्थिणं भंते ! इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए अहे गेहाइवा, गेहावणाइवा ? गोयमा ! णोइणद्वे समढे ॥ २ ॥ अत्थिणं भंते ! भावार्थ छठा शतक का सातवा उद्देशा संपूर्ण हुवा ॥ ६ ॥ ७॥ में सातवे उद्देशे में भरतक्षेत्र का वर्णन कहा. आठवे उद्देशे में पृथ्वी का वर्णन करते हैं. अहो भगवन् ! | पृथ्वी कितनी कही ? अहो गौतम ! आठ पृथ्वीयों कहीं. रत्नप्रभा, शर्करप्रभा यावत् तमतमाप्रभा व ईषत्माग्भार ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! इस रत्नप्रभा पृथ्वी की नीचे क्या गृह व दुकानों हैं ? अहो | | गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं है ॥ २॥ अहो भगवन् ! इस रत्नप्रभा पृथ्वी की नीचे ग्राम यावत । पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र AAAAAAmarwa *380%8 छठा शतकका आठवा उद्देशा 8888
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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