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शब्दार्थ
सूत्र
भावार्थ
48 अनुवदिक - बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी
{ नहीं इ० यह अर्थ त० समर्थ ण० नहीं अ० अन्यत्र वि० विग्रहगति स० समापन ॥ २० ॥ अ० है भं० { भगवन् चं० चंद्र सू० सूर्य जो० नहीं इ० यह अर्थ स० समर्थ अ० है मं० भगवन् क० कृष्णराजियों में (च० चंद्र की कान्ति नो० नहीं इ० यह अर्थ स०योग्य ॥ २१ ॥ क० कृष्णराजियों का भं० भगवन् के ० { कैसा व० वर्ण प० कहा का काला जा० यावत् खिं० शीघ्र वी० व्यतिक्रान्त होवे ||२२|| क० कृष्णराजियों
त्थं विग्गहगइसमावण्णएणं ॥ २० ॥ अत्थिणं भंते ! चंदिम सूरिम ? णो इणट्ठेसम || अथ कहराईसु चंदाभाइ २ वा ? गोइणट्ठे समट्ठे ॥ २१ ॥ कण्हराईणं भंते ! केसियाओ वण्णेणं पण्णत्ताओ ? गोयमा ! कालाओ जाव विपामेव बीईएजा ॥ २२ ॥ कण्हराईणं भंते ! कइनामधज्जा पण्णत्ता ? गोयमा ! अट्ठ
काय
है ? अहो गौतम ! यह अर्थ समर्थ नहीं है, परंतु विग्रहगतिवाले जीव क्वचित् उत्पन्न होते हैं। || २० || अहो भगवन् ! क्या वहां चंद्र सूर्य अथवा चंद्र सूर्य की कान्ति है ? यह अर्थ योग्य नहीं है अर्थात् वहां नहीं है || २१ || अहो भगवन् ! कृष्णराजियों का वर्ण कैसा है ? अहो गौतम ! कृष्णराजियों का वर्ण काला, काली कान्तिवाला यावत् देवता भी उसे देखकर क्षुब्ध होते हैं और शी {ही उते उल्लंघ जाते हैं ॥ २२ ॥ अहो भगवन् ! कृष्णराजियों के कितने नाम कहे हैं ? अहो गौतम !
प्रकाशक- राजाबहादुर लाला सुखदेव सहायजी वामसादजी
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