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शब्दाथ कसप चतुत्र सं० मंठाण से सं० रही हुई अ० आठ रा० राजियों ५० प्ररूपी पु० पूर्व में दो दो प०पश्चिम
में दो० दो दा दक्षिण में दो दो उ. उत्तर में दो० दो पू० पूर्व की अ. आभ्यंतर क. कृष्णराजी : दा० दक्षिण की वा० बाहिर की क० कृष्णराजी को पु० स्पर्शी हुई दा० दक्षिण की अ० आभ्यंतर क. कृष्णराजी ५० पश्चिम की वा० बाह्य कः कृष्णराजियों छ० छकौने वाली दो दो पु० पूर्व प• पश्चिम
कण्हराइं पुट्ठा, दाहिणभंतरा कण्हराई पच्चाच्छम बाहिरं कण्हराइं पुट्ठा पञ्चत्थिमन्भं
तरा कण्हराई उत्तरबाहिरं कण्हराई पुट्टा, उत्तरभंतरा कण्हराई पुराच्छमबाहिरं __ कण्हराई पुट्ठा, दो पुरच्छिम पञ्चाच्छिमाओ बाहिराओ कण्हराईओ छलंसाओ, दो।
उत्तरदाहिणबाहिराओ कण्हराईओ तंसाओ, दो पुराच्छमपञ्चच्छिमाओ अब्भंतरा
ओ कण्हराईओ चउरंसाओ, दो उत्तर दाहिणाओ अभंताराओ कण्हराईओ चउरं भावार्थE कृष्णराजी कहां कही ? अहो गौतम ! सनत्कुमार माहेन्द्र देवलोक की उपर व ब्रह्मदेवलोक की नीचे .
रिष्ट विमान प्रस्तर में अखाडे के समान समचउरंस संठाणो रही हुई हैं. पूर्व में दो, पश्चिम में दो, दक्षिण में दो. उचर में दो. पूर्व की आभ्यंतर कृष्णराजी दक्षिण की बाह्य कृष्णराजी को स्पर्शकर रही हुई है, दक्षिण की आभ्यंतर कृष्णराजी पश्चिम की बाह्य कृष्णराजी को स्पर्शकर रही. है पश्चिम की आभ्यंतर कृष्णराजी उत्तर की वाघ कृष्णराजी को स्पर्शकर रही है और उत्तर की आभ्यंतर कृष्णराजी पूर्व की
48 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी -
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी*