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शब्दार्थ |
सूत्र
भावार्थ
42 पंचमाङ्ग विवाह पण्णारी ( भगवती ) सूत्र 4
जा० यावत् बं० ब्रह्म क० देवलोक में रि० रिष्ट विमान प० प्रस्तर को सं० प्राप्त ए० यहां त० तमस्काय सं० रही हुई है. ॥ २ ॥ त तमस्काय मं० भगवन् किं० क्या सं० संस्थित अ० नीचे म० ( सरावले के मू० मूलस सं० संस्थित उ० ऊपर कु० कूर्कट का पं० पिंजरे से मं० संस्थित ॥ ३ ॥ ततम स्काय मं० भगवन् के० कितनी वि० चौडाई से के० कितनी प० परिधि से प० मरूपी गो० गौतम दू०१७
सोहम्मीसाणसणं कुमारमहिंदे चत्तारिवि कप्पे आवरेत्ताणं उद्धुं पियणं जाव बंभलोए कप्पे रिट्ठविमाणपत्थ संपणे एत्थणं तमुकाए संनिट्ठिए ॥ २ ॥ तमुकाएणं भंते! किं संठिए ? गोयमा ! अहेमलगमूलसंठिए, उप्पि कुक्कुडगपंजरग संठिए पण्णत्ते ॥ ३ ॥ तमुकाएणं भंते ! केवइयं विक्खंभेणं केवइयं परिक्खेवेणं पणते ? गोयमा दुविहे पण्णत्ते तंजहा - खखेज्जवित्थडेय, असंखेज्जवित्थडेय । तत्थणं
चारों देवलोक को घेर कर पांचवे ब्रह्मदवलोक में रिष्ट नामक तीसरी प्रतर में उस के विमानतक गइ हुई है. और वहां परही तमस्काय स्थिर रही हुई है || २ || अहो भगवन् ! तमस्काय का कौनसा संस्थान है? अहो गौतम ! नीचे सरावले के संपुट का आकारवाली है और उपर मूर्गे के पिंजर का आकारवाली ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! तमस्काय चोडाइ में कितनी है, व परिधि में कितनी है ? अहो गौतम ! तम
44 छठ्ठा शतकका पांचवा उद्देशा +4
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