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शब्दार्थ * {असंख्यात दी० द्वीप समुद्र वी०व्यक्तिकान्त करते अ० अरुणवर द्वीपकी वा० बाहिर की वे ० वेदिका से अ० { अरुणोदय स० समुद्र को बा० बीयालीस जो० योजन सहस्र उ० अवगाहकर उ० उपर के ज० जल के अंत से ए० एक प्रदेश की से० श्रेणीसे त。 वहां त० तमस्काय सर्व उत्पन्न हुई स० सत्तरह इ० इक्कीस जो० योजन सहस्र उ० ऊर्ध्व उ० जाकर त० उस प० पीछे ति० तीच्छ प० विस्तृत होती हुई सो० { सौधर्म ई० ईशान स० सनत्कुमार म० माहेन्द्र च० चारों क० कल्प को आ० ढककर उ० ऊर्ध्व । दीवस बाहिरिल्लाओ वेइयंताओ अरुणोदयं समुदं बायालीस जोयण सहस्साि उग्गाहित्ता उवरिल्लाओ जलंताओ एग पदेसियाए सेढीए तत्थणं तमुकाए समुट्ठिए सत्तर एक्कवीसे जोयणसए उट्टं उप्पइत्ता तओ पच्छा तिरियं पवित्थरमाणे २ अरुणवरद्वीप आता है, उस अरुणवरद्वीप की बाहिर की वेदिका से ४२ हजार योजन दूर अरुणवर { समुद्र में जावे वहां पानी के उपर अंतिम विभाग की एक प्रदेश की + श्रेणी में से तमस्काय नीकली हुई है वहां से १७२१ योजन ऊंची जाकर तीच्छी विस्तृत होती हुई सौधर्म, ईशान, सनत्कुमार व माहेन्द्र इन
सूत्र
भावार्थ
42 अनुवादक - लब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषीजी
÷ यहां प्रदेश शब्द से आकाश का मात्र एक प्रदेश ग्रहण करना नहीं, क्योंकि एक प्रदेश में अकाय नहीं ठहर सकती है. षरंतु जैसे एक प्रदेश में साधु समोसरे अर्थात् थोडे क्षेत्र में रहे, वैसे ही यहांपर एक प्रदेश का कथन किया है. अर्थात् थोडा क्षेत्र जानना.
* प्रकाशक- राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी
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