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________________ ba छठा शतक 2 ओ ओरालिय वेउब्विय सरीराणं जीवेगिंदियवज्जो तियभंगो आहारगसरीरे जीव मणु एमु छब्भंगा, तेयग कम्मगाई जहा ओहिया, असरीरेहिं जीव सिद्धेहिं तियभंगो, ॥ आहार पज्जत्तीए सरीर पजत्तीए इंदियपजत्तीए आणापाण पजत्तीए जीवेगिदियवजो ७८९ तियभंगो, भासामणपजत्ती जहासन्नी आहारअपज्जत्ती . जहा अणाहारगा, सरीर # देवलोक में नहीं है इसलिये यह भांगा नहीं लीया गया है. वैक्रेय शरीर पृथ्वी, अप, तेउ, वनस्पति व विकलेन्द्रिय में नहीं है. चायुकाय में एक भांगा, और शेष में तीन भांगे. आहारक शरीर जीव व मनुष्य अ इन दोनों पद में होवे. आहारक जीव के अल्पपना से इन में छ भांगे मीले. तेजस कार्माण में जीवादिक भावार्थ पद औधिक जैसे कहना. अर्थात् जीवपद में सपदेशी और नारकादि पद में तीन भांगे जानना. एके न्द्रिय में एक तीसरा भांगा. अशरीरी के दूसरे दंडक में जीव व सिद्ध में तीन भांगे. आहार पर्याप्ति, शरीर पर्याप्ति, इन्द्रिय पर्याप्ति, व श्वासोश्वास पर्याप्तिाले जीवों के दूसरे दंडक में जीव व एकेन्द्रिय में एक ही भांगा और शेष नरकादि में तीन भांगे. भाषामन पर्याप्ति संज्ञी जैसे जानना. अर्थात् सबई ४० 60 पद में तीन भांगे कहना. आहार अपर्याप्तिवन्त बहुत जीव विग्रहगति संपन्न होते हैं इसलिये एक भांगा | और अन्य सब स्थान छ भांगे. शरीर अपर्याप्ति, इन्द्रिय अपर्याप्ति, श्वासोश्वास अपर्याप्तिवाले के दूसरे दंडक ७ में जीव व एकेन्द्रिय छोडकर शेष में तीन भांगे. जीव व एकेन्द्रिय में एक भांगा. तरक. देव व 424 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मत्र
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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