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सूत्र
भावार्थ
4848 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र 60-6
जीवादिओ तियभंगो, एगिंदिएस अभंगकं, कोहकसाईहिं जीवेगिंदियवज्जो तियभंगो, देवेहिं छब्भंगो, माणकसाई माइकसाई जीवेगिंदियवज्जो तियभंगो, नेरइय देवेहिं छब्भंगा, लोभकसाईहिं जीवेगिंदयवज्जो तियभंगो, नेरइएसु छब्भंगा अक्साई जीवम एहिं सिद्धेहिं तियभंगो ओहियणाणे आभिणिबोहियणाणे सुयणाणे जीवादिओ तियभंगो, विगलिदिएहिं छन्भंगा, ओहिणाणे मणपजवणाणे केवलणा जीवादियओ तियभंगो ओहिए अण्णाणे मतिअण्णाणे सुयअण्णाणे एगिंदियवज्जो तियभंगो, विभंगणाणे जीवादिओ तियभंगो ॥ सजोई जहा ओहिओ मणजोगि वइजोगि, कायजोगि, जीवादिओ तियभंगो, णवरं कायजोगी एगिंदिया तेसु अभंगकं, इस में विकलेन्द्रिय नहीं कहना. मनःपर्यव ज्ञान के दुसरे दंडक में जीव व मनुष्य में तीन भांगे केवलज्ञान में {जीव, मनुष्य व सिद्ध पदमें तीन भांगे जानना. समुच्चय अज्ञान, मति अज्ञान व श्रुत अज्ञानमें जीवादि पदमें तीन भांगे, पृथिव्यादिक में एक भांगा विभंगज्ञान को अवधि ज्ञान जैसे कहना. सजोगीमें औधिक जीवादिक का कहा वैसे जानना. मनयोगी संज्ञी, वचन योगी एकेन्द्रिय वर्ज कर सब, और काययोगी में सब जीव इन में तीन भांगे पावे. परंतु काययोगी में दूसरे दंडक में एकेन्द्रिय को एक मांगा पावे. अयोगी अलेशी { जैसे कहना. साकारोपयोग व अनाकारोपयोग के दुसरे दंडक में नरकादिक में तीन भांगे. जीत्र पद व
१०५ छठा शतक का चौथा उद्देशा
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