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शब्दार्थ
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पण्णत्ति (भगवती) सूत्र
तीन भ. भजना उ० उपर का न नहा बं० दांधता है ॥ ८॥ ना० ज्ञानावरणीय किं. क्या स. सम्यगू दृष्टि बं० बांधता है मि० मिथ्यादृष्टि बं० बांधता है स० सम्यग्मिथ्या दृष्टि बं० बांधता
डिल्ला तिण्णि भयणाए उबरिलो न बंधइ ॥ ८ ॥ नाणावराणिजं भंते ! कम्मं किं सम्मादट्ठी बंधइ, मिच्छदिट्ठी बंधइ, सम्मामिच्छदिट्ठी बंधइ ?गोयमा! सम्मादट्ठी सियबंधइ सिय नोबंधइ, मिच्छादिट्ठी बंधइ, सम्मामिच्छदिट्ठी बंधइ । एवं आउगवज्जा
ओ सत्तवि, आउएहडिल्ला दो भयणाए सम्मामिच्छदिट्ठी नबंधइ ॥ ९ ॥ नाणावरणं परंतु सिद्ध नहीं करते हैं. ऐसे ही आयुष्य छोडकर शेष सात कर्मों का जानना. संयति, असंयति व संयतासंयति आयुष्य का बंध क्वचित् करते हैं व क्वचित नहीं करते हैं. सिद्ध आयुष्य कर्म का बंध नहीं करते हैं ॥ ८ ॥ अहो भगवन् ! क्या समदृष्टि ज्ञानावरणीय कर्म बांधते हैं, मिथ्यादृष्टि ज्ञानावरणीय कर्म बांधते हैं, या सममिथ्यादृष्टि ज्ञानावरणीय कर्म बांधते हैं ? अहो गौतम ! समदृष्टि ज्ञानावरणीय कर्म क्वचित् बांधते हैं व क्वचित् नहीं बांधते हैं. मिथ्यादृष्टि व सममिथ्यादृष्टि ज्ञानापरणीय * कर्म बांधते हैं. ऐसे ही आयुष्य छोडकर शेष सात का जानना. समदृष्टि व मिथ्यादृष्टि आयुष्य कर्म क्वचित् बांधते हैं व क्वचित् नहीं बांधते हैं. सममिध्यादृष्टि आयुष्य कर्म नहीं बांधते हैं ॥९॥ ज्ञाना-14।
48800388 छट्टा शतकका तीसरा उद्देशा
भावार्थ