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________________ ७६३ शब्दार्थ जा० यावत् वे० वैमानिक ॥ ३ ॥ व० वस्त्र के० भ० भगवन् पो० पुगलोपचय में किं० क्या सा० आदि स० मान्त सा० सादि अ० अनंत अ० अनादि स० सांत अ. अनादि अ० अनंत ज० जैसे भं० एवं जस्स जोप्पओगो जाव वेमाणियाणं ॥ ३ ॥ वत्थस्सणं भंते ! पोग्गलोवचए किं सादीए सपज्जवसिए, सादीए अपज्जवसिए, अणदीए, सपज्जवसिए, अणादीए अपजवसिए ? गोयमा ! वत्थस्सणं पोग्गलोवचए सादीए सपजवसिए, नोसादिए अपजवसिए, नो अणादीए सपजवासिए नोअणादीए अपजवसिए ॥ जहाणं भंते ! वत्थस्स पोग्गलोवचए सादीए सपज्जवसिए, नोसादीए अपजवसिए णो अणादीए सपज्जवसिए नोअणादीए अपज्जवसिए, तहाणं जीवाणं कम्मावेचए पुच्छा, गोयमा ! भावार्थ जो प्रयोग होवे वैसा वैमानिक तक जानना ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! वस्त्र का पुद्गलोपचय क्या आदि अंत-है. वाला है, आदि अंत रहित है, अनादि सान्त है व अनादि अनंत है ? अहो भगवन् ! वस्त्र के पुद्गलों का उपचय आदि सान्त है. इस में शेष तीन भांगे नहीं मिल सकते हैं. अहो भगवन् ! जैसे वस्त्र 50 का पुद्गलोपचय सादि सान्त, परंतु सादि अनंत, अनादि सान्त व अनादि अनंत नहीं है वैसे ही क्या कर्म का उपचय सादि सान्त यावत् अनादि अनंत है ? अहो गौतम ! कितनेक जीवों का कर्मोपचय सादिसान्त है, कितनेक को अनादि सांत है और कितनेक को अनादि अनंत है परंतु सादि अनंत नहीं है। 948 पंचांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 488 छठा शतकका तीसरा उद्देशा +4882
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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