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शब्दार्थभि० भेदाते हैं जा० यावत् प० परिणमते है ते• इसलिये ॥ २ ॥ ३० वस्त्र के भ० भगवन् ? 4
80/पो० पुद्गलों का उ० : उपचय किं. क्या ५० प्रयोग से पी. सभाव से गो० गौतम ११५० प्रयोग से भी वी० स्वभाव से भी ज• जैसे त० तैसे क० कर्मों का उ० उपचय किं. क्या । ५० प्रयोग से वी० स्वभाव से गो० गौतम प० प्रयोग से नो० नहीं वी० स्वभाव से के० कैसे गो० गौतम / भिजति जाव परिणमंति. से तेणटेणं ॥ २ ॥ वत्थस्सणं भंते ! पोग्गलोवचये किं ३ पयोगसा वीससा ? गोयमा ! पयोगसावि, वीससावि, जहाणं भंते ! वत्थस्सणं पोग्गलोवचये पयोगसावि, वीससावि, तहाणं जीवाणं कम्मोवचए, किं पयोगप्ता, वीससा ? गोयमा ! पयोगसा नो वीससा । से केणट्टेणं ? गोयमा ! जीवाणं तिविहे
पओगे पण्णत्ते तंजहा मणप्पओगे, वइप्पओगे, कायप्पओगे, इच्चेतेणं तिविहेणं पयोक्रिया व वेदनावाले को कर्म पुद्गल छेदाते भेदाते हैं और उन का आत्मा सुखपने परिणमता है ॥२॥ अहो भगवन् ! वस्त्र के पुद्गलों का उपचय क्या स्वभाव से होता है या प्रयोग से होता है ? अहोई गौतम ! वस्त्र के पुद्गलों का उपचय स्वभाव से होता है परंतु प्रयोग से नहीं होता है. अहो भगवन् ! जैसे वस्त्र के पुद्गलों का उपचय प्रयोग व स्वभाव दोनों से होता है वैसे ही क्या जीव के कर्मों का उप-है चय स्वभाव से होता है या प्रयोग से होता है ? अहो गौतम ! जीवों को कर्मों का उपचय स्वभाव से
...4.११.१ पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 8220
छठा शतक का तीसरा उद्देशा 884884
भावार्थ