________________
शब्दार्थ सहित स० मध्य सहित स० प्रदेश सहित ज० यदि दे० देनानुप्रिय न० नहीं गि० खेदिन होवे प० कहने ।
1 ए ॥ ३ ॥ तएणं से नियंठिपुत्ते अणगारे नारयपुत्तं अणगारं एवं वयासी दव्वा | । एसेणवि अजो ! सव्व पोग्गला सपएसावि अपएसावि अणंता, खेत्ताएसेणवि एवं चेव, * ७१९
कालाएसेणवि. भावाएसेणवि एवं चेव । जे दवओ अपएसे, से खेत्तओ नियमा अपभावार्थ से इस का अर्थ सुनने को इच्छता हूं ॥ ३ ॥ तव निर्ग्रन्थी पुत्र अनगारने नारदपुत्र को ऐसा कहा कि
अहो आर्य! द्रव्य, क्षेत्र, काल व भावादेश से सब पुद्गलों प्रदेश सहित भी हैं व प्रदेश रहित से हैं क्योंकि इसमें द्विप्रदेशात्पकादि स्कंध व परमाणु पुद्गल रहे हुवे हैं और वे अनंत हैं. क्षेत्रादेश
से आकाश के द्विपदेशी स्कंध को अवगाहकर रहनेवाले पुद्गल सप्रदेशी हैं और एक आकाश प्रदेशावगाही पुद्गल में 5 अप्रदेशी हैं. काल से दो तीन वगैरह समय की स्थितिवाले पुद्गल सप्रदेशी हैं और एक समय की स्थिति
गैरह गनकाले दव्य सप्रदेशी हैं और एक गुनकाला द्रव्य अप्रदेशी है, जो द्रव्य से अप्रदेशी होते हैं वे क्षेत्र से निश्चयही अप्रदेशी होते हैं क्यों की द्रव्य से अप्रदेशी bo , परमाणु पुद्गल एक प्रदेशावगाही होता है. काल से क्वचित् सप्रदशी होता है, क्वचित् अप्रदेशी होता है,
यदि वह परमाणु एक समय की स्थितिवाला होवे तो अप्रदेशी और अनेक समय की स्थिति वाला होवे | तो सप्रदेशी. भाव से भी क्वचित् सप्रदेशी व क्वचित् अप्रदेशी हैं क्यों कि जो एक गुनकालादि है वह
विवाह पण्णत्ति ( भवगती ) सूत्र
४.49 पांचवा शतक का आठवा उद्देशा 988-89
ल अप्रा
.
भा
.
दा