SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 743
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ 8380 शब्दार्थ जैसे ति तिर्यंच त० तेसै म० मनुष्य भा० कहना ॥ १४ ॥ वा० वाणव्यंतर जो० ज्योतिषी वे० वैमा निक ज० जैसे भ० भवनवासी त० तैसे ने० जानना ॥ १५ ॥ पं० पांच हे० हेतु प० कहा तं० वह ज. तिरिक्ख जोणिया तहा मणुस्सावि भाणियव्या ॥ १४ ॥ वाणमंतर जोइसिय वेमाणिया जहा भवणवासी तहा नेयव्वा ॥ १५ ॥ पंचहेऊ पण्णत्ता, तंजहा-हेउं जाणइ, हेउं पासइ, हेउं बुज्झइ, हेउं अभिसमागच्छइ, हेउं छउमत्थमरणं मरइ पंचहेऊ पण्णत्ता तंजहा हेउणा जाणइ जाव हेउणा छउमत्थमरणं मरइ । पंचहेऊ 'पण्णत्ता, तंजहा-हेउं न जाणइ जाव हेडं अण्णाण मरणं मरइ, पंचहेऊ पण्णत्ता, भावार्थ, वाणव्यंतर, ज्योतिषी, व वैमानिक को भवनपति जैसे कहना. ॥ १५ ॥ जो परिग्रही होते हैं वे छद्मस्थ होते हैं और छद्मस्थ हेतुसे जानते हैं इसलिये आगे हेतुका प्रश्न पुछते हैं. हेतु पांच प्रकार के कहे हैं. १ हेतु जानते हैं अर्थात् साध्य निश्चयार्थ के लिये जानते हैं २ सामान्यता से जानते हैं३ सम्यक् प्रकारसे श्रद्धते ४० हैं४ हेतु में प्रवर्ते और५ हेतु छद्मस्थ मरण मरे. और पांच प्रकार के हेतु कहे हैं. हेतु से जाने यावत् । *हेतु से छमस्थ मरण मरे. पांच हेतु-हेतु को जाने नहीं यावत् हेतु अज्ञान मरण मरे. पांच हेतुकहे-हेतुसे जाने नहीं यावर हेतु से अज्ञान मरण मरे. पांच अहेतु कहे हैं अहेतु जाने यावत् अहेतु केवली मरण मरे. पण्णत्ति ( भगवती) पांचवा शतक का सातवा उद्देशा 8-48
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy