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शब्दार्थ जैसे ति तिर्यंच त० तेसै म० मनुष्य भा० कहना ॥ १४ ॥ वा० वाणव्यंतर जो० ज्योतिषी वे० वैमा
निक ज० जैसे भ० भवनवासी त० तैसे ने० जानना ॥ १५ ॥ पं० पांच हे० हेतु प० कहा तं० वह ज.
तिरिक्ख जोणिया तहा मणुस्सावि भाणियव्या ॥ १४ ॥ वाणमंतर जोइसिय वेमाणिया जहा भवणवासी तहा नेयव्वा ॥ १५ ॥ पंचहेऊ पण्णत्ता, तंजहा-हेउं जाणइ, हेउं पासइ, हेउं बुज्झइ, हेउं अभिसमागच्छइ, हेउं छउमत्थमरणं मरइ पंचहेऊ पण्णत्ता तंजहा हेउणा जाणइ जाव हेउणा छउमत्थमरणं मरइ । पंचहेऊ
'पण्णत्ता, तंजहा-हेउं न जाणइ जाव हेडं अण्णाण मरणं मरइ, पंचहेऊ पण्णत्ता, भावार्थ, वाणव्यंतर, ज्योतिषी, व वैमानिक को भवनपति जैसे कहना. ॥ १५ ॥ जो परिग्रही होते हैं वे छद्मस्थ
होते हैं और छद्मस्थ हेतुसे जानते हैं इसलिये आगे हेतुका प्रश्न पुछते हैं. हेतु पांच प्रकार के कहे हैं. १ हेतु जानते हैं अर्थात् साध्य निश्चयार्थ के लिये जानते हैं २ सामान्यता से जानते हैं३ सम्यक् प्रकारसे श्रद्धते ४० हैं४ हेतु में प्रवर्ते और५ हेतु छद्मस्थ मरण मरे. और पांच प्रकार के हेतु कहे हैं. हेतु से जाने यावत् । *हेतु से छमस्थ मरण मरे. पांच हेतु-हेतु को जाने नहीं यावत् हेतु अज्ञान मरण मरे. पांच हेतुकहे-हेतुसे जाने
नहीं यावर हेतु से अज्ञान मरण मरे. पांच अहेतु कहे हैं अहेतु जाने यावत् अहेतु केवली मरण मरे.
पण्णत्ति ( भगवती)
पांचवा शतक का सातवा उद्देशा 8-48