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शब्दार्थ
* उपकरण ५०.परिग्रहीत भ० होते हैं ए. ऐसे जा. यावत् च० चतुरेन्द्रिय ॥ १२ ॥ पं० पंचेन्द्रिय नि०
तिर्यंच तं० वैसे जा. यावत् क० कर्म परिग्रहीत टं० छेदेहुए पर्वत कू० शिखर से मुं० मुण्ड पर्वत सि० सि. शिखर वाले पर्वत ५० किंचित् नमे हुवे ज. जल थ० स्थल वि० बिल गु० गुफा ले. उत्कीर्ण पर्वती गृह उ० पानी नीचे पड़ने का स्थान नि झरने के स्थान चि० कीचड मीश्रित जल स्थान ५० आनंद
भवंति. सचित्ताचित्त जाव भांति, एवं जाव चउरिंदिया ॥ १२ ॥ पंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं भंते ! तंचेव जाव कम्मापरिग्गहिया भवंति, टंका-कूडा-सेलासिहरी-पब्भारा-परिग्गहिया भवंति, जल-थल-बिल-गुह-लेणा-परिग्गहिया भवंति, उज्झर-निज्झर-चिल्लल-पल्लल-चिप्पिणा-परिग्गहिया भवंति, अगड-तडाग-दह-नदीओ
वावी-पुक्खरिणी-दीहिया-गुंजालिया-सरा-सरपंतियाओ सरसरंपंतियाओ, बिलपंतियाभावार्थ तिर्यंच पंचेन्द्रिय पृथ्वीकाय यावत् स काया का आरंभ करते हैं. उन को शरीर, कर्म का परिग्रह रहाहुवा
है. टंक, कूट, सेले, शिखर व किंचित नमे हुवे शिखर का परिग्रह रहा हुवा है. जलस्थान, स्थलस्थान, बिल, गुफा व आश्रय स्थान का परिग्रह रहा हुवा है. पर्वत के झरणे. निर्झरणे, कीचड, प्रल्हादक स्थान व क्यारे का परिग्रह रहा हुवा है. कूने, तालाव, नदी, वापि, पुष्करणी, दीर्घिका, चक्राकार वापि, बडे
१ छिन्नटंकाः टांके २ शिखणि हस्त्यादि बंधनस्थानानिवा ३ मुण्ड पर्वत.
बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी 87
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी **