SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 726
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ शब्दार्थ bro १०१ अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिनी - स० प्रदेश सहित को नहीं अ० अर्ध रहित णो नहीं स० मध्य सहित नो नहीं अ० प्रदेश रहित । ति० तीन प्रदेश की पु० पृच्छा खं० स्कंध गो० गौतम १० अर्थ रहित स० मध्य सहित स० प्रदेश सहि नो० नहीं अ० अर्थ सहित नो० नहीं अ० मध्य रहित नो नहीं अ० प्रदेश रहित जैसे दु० द्विप्रदेशी ० तैसे जे. जो स० सप ते वे भा० कहना जे० जो वि० विषम ते वे ज. जैसे ति तीन प्रदेशा त्मक त० तैसे भा० कहना सं० संख्यातपदेशात्मक भं० भगवन् ख• स्कंध किं० क्या स० अर्ध अणड्डे अमझे अपएसे ? गोयमा ! सअड्डे अमझे, सपएसे, नो अणड्डे, नो समझे, नो अपएसिए । तिपएसिएणं भंते ! खंधे पुच्छा । गोयमा ! अण्ड्डे समझे सप, एसे नो सअड्डे नो अमज्ञ नो अपएसे जहा दुपएसिओ तहा जेसमा ते भाणियव्या. . जे विसमा ते जहा तिपएसिओ, तहा भणियचो. ॥ * ॥ संखेजपएसिएणं भंते ! } प्रदेशी स्कंध क्या अर्थ, मध्य व प्रदेश सहित है या अर्ध मध्य व प्रदेश रहित है ? अहो गौतम ! द्वि प्रदेशी स्कंध दो परमाणु का बनाहुआ होने से अर्थ सहित है, मध्य रहित है, व प्रदेश सहित है. अहो भगवन् ! तीन प्रदेशी स्कंध क्या अर्ध मध्य व प्रदेश सहित है अथवा अर्थ, मध्य व प्रदेश रहित है ? अहो गौतम ! तीन प्रदेशी स्कंध में तीन प्रदेश होने से अर्ध नहीं हैं परंतु मध्य व प्रदेश रहे हुवे हैं. इसी , तरह आगे २-४-६-८ वगैरह जो सम राशि है उस को द्वि प्रदेशी स्कंध जैसे कहना और ३-५-७-९7 * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ |
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy