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शब्दार्थ आवे त० तहां वि विनाश आ. प्राप्त होवे उ. पानी का आ आवर्त उ०पानी का वि०बिंदु उ० अवगाह ।
कर से० अथ त० तहां प० नष्टहावे ॥२॥५० परमाण पो० पदल किं. क्या स० अर्ध सहित स०१00 १ मध्य सहित स० प्रदेश सहित उ० अथवा भ० अर्ध रहित अ० मध्य रहित अ. प्रदेश रहित गो० गौतम १९५
अ. अर्ध रहित अ० मध्य रहित अ० प्रदेश रहित नो नहीं अ० अर्ध सहित नो० नहीं स०मध्य सहित नोक नहीं स. प्रदेश सहित दु. द्विप्रदेशी स्कंध किं० क्या गो० गौतम अ० अर्ध सहित अ० मध्य रहित
गच्छेज्जा, तहिं विणिहाय मावज्जेजा, उदगावत्तवा, उदगंबिंदुवा उग्गाहेजा, सेणं तत्थ परियावज्जेज्जा, ॥ २ ॥ परमाणु पोग्गलेणं भंते ! किं सअड्डे समझ सपएसे उदाहु अणड्डे, अमझे, अपएसे ? गोयमा ! अणड्डे अमझे अपएसे, नोसअड्डे, नो
समझे नो सपएसे । दुपएसिएणं भंते ! खंधे किं सअड्डे, समझे, सपएसे उदाहु में भावार्थ हैं. ऐसे ही गंगा महानदी के प्रवाह में कितनेक अनंत प्रदेशी स्कंध नष्ट होते हैं कितनेक नष्ट नहीं होते हैं.'
हकितनेक अनंत प्रदेशात्मक स्कंध पानी के आवर्त को या पानी के बिन्दु को अवगाह कर रहेते हैं? है॥२॥ अहो भगवन् ! क्या परमाणु पुद्गल अर्ध, मध्य व प्रदेश सहित है अथवा अर्ध, प्रदेश व मध्य रहित । है ? अहो गौतम ! परमाणु पुद्गल अर्थ, मध्य व प्रदेश रहित है. अर्ध, मध्य व प्रदेश सहित नहीं है. क्यों की परमाणु पुद्गल अत्यंत ही मूक्ष्म है और उम्र का विभाग नहीं होसकता है. अहो भगवन् ! द्वि
g- पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र
पांचवा शतकका सातवा उद्देशा24