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शब्दार्थ
बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी -
भावार्थ
को प० परिणमता है सि०क्वचित् णो नहीं ए०चलता है ा यावत् नोनहीं तं० उस २ भा भाव में प.. परिणमता है सि० क्वचित् दे देश से ए. चलता है जा. यावत् प० परिणमता है दु० द्विप्रदेशी
गोयमा ! सिय एयइ, सिय नो एयइ, सिय देसे एयइ नो देसे एयइ, सिय देसे है एयइ नो देसा एयंति, सिय देसा एयति नो देसे एयइ, । चउप्पएसिएणं भंते ! खंधे।
एयइ ? गोयमा ! सिय एयइ, सिय नो एयइ, सिय देसे एयइ णो देसे एयइ, सिय
देसे एयइ णो देसा एयंति. सिय देता एयंति नो देसे एयइ, सिय देसा एयंति नो प्रदेशी स्कंध क्वचित् चलता है, यावत् क्वचित् उन २ भावोंमें परिणमता है, वैसे ही क्वचित् नहीं चलता है यावत् उन २ भावों में नहीं परिणमता है, और क्वचित् देश से चलता है व देश से नहीं चलता है. अहो भगवन् ! तीन प्रदेशात्मक स्कंध क्या चलता है यावत् उन २ भावों में परिणमता है ? अहो गौतम! तीन प्रदेशात्मक स्कंध में पांच विकल्प कहे हुए हैं ? क्योचत् चले २ क्वचित् नचले ३ क्वचित् देश से चले व नचले ४ क्वचित् देश से एक चले दो नहीं चले और ५ क्वचित् देश से दो चले एक नहीं चले. अहो भगवन् ! चार प्रदेशात्मक स्कंध क्या चले ? अहो गौतम ! चार प्रदेशात्मक स्कंध में छ विकल्प होते हैं. १ क्वचित् कंपे २ क्वचित् नहीं कंपे ३ क्वचित् देश से कंपे व कंपे नहीं ४ क्वचित् एक देश से चले बहुत देश से चले नहीं ५ क्वचित् बहुत देश से चले एक देश से चले नहीं और ६ क्वचित् बहुत
प्रकाशक-राजीबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
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