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शब्दार्थ
सूत्र
भावार्थ
4 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र 480
उस प० पीछे वे० वेदते हैं ॥ ५ ॥ ६ ॥
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प० परमाणु पो० पुद्गल ए० चलता है वे० विशेष चलता है जा० यावत् तं० उस २ भा० भाव में प० परिणमता है गो० गौतम सि० क्वचित् ए० चलता है वे० विशेष चलता है तं० उस २ भा० भाव ६९ से पच्छा वेदेइ सेवं भंते भंतेत्ति ॥ पंचमसयस्स छट्टो उद्देसो सम्मतो ॥५॥६॥ परमाणुपोग्गलेणं भंते ! एयइ वेयइ जाव तंतं भावं परिणमइ ? गोयमा ! सिय इ वेइ जाव परिणमइ, सिय णो एयइ जाव णो परिणमइ, दुपदेसिएणं भंते ! खंधे एइ जात्र परिणमइ ? गोयमा ! सिय एयइ जाव परिणमइ सिय नो एयइ जाव नो परिणमइ, सिय देसेएयइ देसे गोएयइ ! तिपएसिएणं भंते ! खंधे एयइ ? उद्देशा संपूर्ण हुवा ॥ ५ ॥ ६ ॥
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छठे उद्देशे के अंत में निर्जरा का कथन किया वह निर्जरा कर्मों को
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* पांचवा शतक का सातवा उद्देशा
चलाती है इसलिये पुद्गलों
का प्रश्न पूछते हैं. {हैं, विशेष चलते हैं
अहो भगवन् ! पूरण गलन स्वभाव वाले निखयत्र रूप परमाणु पुद्गल क्या चलते यावत् उन २ भावों में परिणमते हैं ? अहो गौतम !
क्वचित् चलते हैं यावत् । क्वचित् उन २ भावों में परिणमते हैं और क्वचित् नहीं चलते हैं यावत् उन २ भावों में नहीं परिणमते हैं. अहो भगवन् ! क्या द्वि प्रदेशात्मक स्कंध चलता है यावत् जन २ भावों में परिणमता है ? अहो गौतम । द्वि